साइलेंट स्ट्रोक या साइलेंट ब्रेन इंफार्क्ट ऐसी स्थिति है, जब दिमाग के किसी छोटे हिस्से में कुछ समय के लिए रक्त प्रवाह रुक जाता है। इससे मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता है, लेकिन कई मामलों में मरीज को कोई स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते। अक्सर सिरदर्द, चक्कर या किसी अन्य कारण से कराए गए एमआरआई में इसका पता चलता है। एक्सपर्ट के अनुसार इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यह भविष्य में गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का संकेत हो सकता है।
किन लोगों में ज्यादा होता है खतरा?
एक्सपर्ट के मुताबिक हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान या तंबाकू का सेवन, मोटापा, हृदय रोग, अनियमित धड़कन और 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में साइलेंट स्ट्रोक का खतरा अधिक होता है। जिन लोगों के परिवार में स्ट्रोक या हृदय रोग का इतिहास रहा है, उन्हें भी नियमित स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए।
डिमेंशिया का कैसे बढ़ता है खतरा?
अगर समय-समय पर कई साइलेंट स्ट्रोक होते रहें, तो मस्तिष्क की कोशिकाओं को लगातार नुकसान पहुंचता है। इससे याददाश्त कमजोर होने लगती है और वैस्कुलर डिमेंशिया का खतरा बढ़ सकता है। एक्सपर्ट का कहना है कि समय रहते जोखिम कारकों को नियंत्रित कर लिया जाए तो भविष्य में बड़े स्ट्रोक और याददाश्त से जुड़ी समस्याओं के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
कैसे करें बचाव?
साइलेंट स्ट्रोक से बचने के लिए ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना जरूरी है। नियमित व्यायाम करें, संतुलित भोजन लें, पर्याप्त नींद लें और धूम्रपान व तंबाकू से दूरी बनाए रखें। यदि स्ट्रोक का खतरा अधिक है तो समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराएं और एक्सपर्ट की सलाह के अनुसार दवाओं का नियमित सेवन करें। समय पर सावधानी और सही जीवनशैली अपनाकर इस जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
