बीमारी के बीच प्रेमानंद जी का भावुक संदेश, बोले- मैं रहूं या न रहूं, साथ हमेशा रहूंगा, भक्तों में बढ़ी चिंता !
वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज ने अपने भक्तों और शिष्यों के लिए एक भावुक संदेश जारी किया है। उन्होंने वीडियो के जरिए कहा कि चिंता करने की जरूरत नहीं है और भजन तथा नाम जप पर ध्यान देना चाहिए। उनका यह संदेश सामने आने के बाद भक्तों के बीच भावुक माहौल देखने को मिला। पिछले कुछ दिनों से उनकी तबीयत को लेकर लगातार चर्चा चल रही थी और अब इस वीडियो ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
9 दिन से बंद है पदयात्रा
संत प्रेमानंद महाराज की रात्रि पदयात्रा पिछले 9 दिनों से बंद है। बताया गया कि 17 मई से उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है, जिसके चलते उन्होंने पदयात्रा रोक दी। वह इन दिनों भक्तों से व्यक्तिगत मुलाकात भी नहीं कर रहे हैं। हर दिन तड़के होने वाली उनकी पदयात्रा में हजारों श्रद्धालु शामिल होते थे, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से फिलहाल यह सिलसिला रुका हुआ है।
भक्तों को दी खास सीख
वीडियो में प्रेमानंद महाराज ने अपने भक्तों से कहा कि उन्हें किसी तरह की चिंता नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जहां जिस सेवा में हैं, वहीं समर्पण के साथ जुड़े रहें। उन्होंने नाम जप और भजन को सबसे बड़ा सहारा बताया। उन्होंने यह भी कहा कि उनका एकांतवास अपने लिए नहीं बल्कि भक्तों के लिए है और सही समय आने पर वह फिर संवाद करेंगे।
स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी चिंता
प्रेमानंद महाराज की दोनों किडनी खराब होने की जानकारी पहले भी सामने आ चुकी है। बताया जाता है कि उन्हें सप्ताह में कई बार डायलिसिस की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के बावजूद कुछ दिन पहले वह अपने गुरु संत गोविंद शरण महाराज के दर्शन के लिए आश्रम से बाहर भी गए थे, जिसकी तस्वीरें भी सामने आई थीं।
हजारों भक्त करते हैं इंतजार
जब भी प्रेमानंद महाराज पदयात्रा पर निकलते हैं, उनके दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। सामान्य दिनों में हजारों लोग उनके दर्शन करने आते हैं, जबकि विशेष अवसरों और छुट्टियों के दौरान यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है। 17 मई को भी बड़ी संख्या में भक्त पहुंचे थे, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से उन्हें दर्शन नहीं मिल सके।
13 साल की उम्र में छोड़ा घर
प्रेमानंद महाराज का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में हुआ था। बचपन में उनका नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। कम उम्र से ही उनका झुकाव अध्यात्म की ओर रहा। 13 साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ दिया और आध्यात्मिक मार्ग चुन लिया। बाद में गुरु दीक्षा लेकर वह वृंदावन पहुंचे और धीरे-धीरे आध्यात्मिक जगत का बड़ा नाम बन गए।
