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चिंता : दुबले-पतले लोगों का भी दिल देने लगा दगा

चिंता : दुबले-पतले लोगों का भी दिल देने लगा दगा

न्यूजप्लस डेस्क, राजेश द्विवेदी। सालों से मिथ है कि मोटे लोगों का दिल कमजोर रहता है जबकि दुबले-पतले लोगों का दिल मजबूत होता है, उन्हें जल्द हार्ट रोग नहीं पकड़ता है पर यह मिथ अब टूट चुका है। एलपीएस कॉर्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट भी 134 हार्ट मरीजों की डीप स्टडी में इसकी गवाही दे रहा है। इस नए ट्रेण्ड से डॉक्टर भी मान रहे हैं कि लाइफ स्टाइल में आए बदलाव ने खतरे की घंटी बजा दी है।
कॉर्डियोलॉजी में 134 गोल्डेन ऑवर में पहुंचे मरीजों की डॉटा आधारित स्टडी ने इलाज की नई गाइडलाइड पर भी फोकस करने का सुझाव दिया है। गोल्डेन ऑवर के मरीजों को जीवनरक्षक इंजेक्शन (टेनेक्टेप्लेस) दिए गए। सामान्य तौर पर माना जाता है कि यह इंजेक्शन प्रभावी जान बचाने में प्रभावी भूमिका अदा करता है लेकिन इससे इतर , मोटे की बजाए दुबले-पतले हार्ट मरीजों को बचाने में कम असरदार हुआ है। गोल्डेन ऑवर में पहुंचे हार्ट मरीजों को एलपीएस कार्डियोलाजी इंस्टीट्यूट में डॉक्टरों ने फ्री में जीवनरक्षक इंजेक्शन लगाया गया पर वह 17 फीसदी मरीजों की जान बचाने में विफ ल पाया गया।
स्टडी रिपोर्ट की माने तो कार्डियोलाजी में 60 किलो से कम वजन के हार्ट रोगियों को 30 एमजी की डोज जीवनरक्षक इंजेक्शन की 71 मरीजों को दी गई लेकिन उसमे ं14 की मौत हो गई जबकि 57 ही जिंदगी पा सके। इसी तरह 60 किलो से ज्यादा वजन के हार्ट अटैक के 63 मरीजों को यह इजेक्शन 40 एमजी के डोज में दिया गया तो उसमें 9 मरीजों की मौत हो गई और 54 मरीज की ही जिंदगी बच सकी। राज्य सरकार हार्ट रोगियों को 50 हजार का यह जीवनरक्षक इंजेक्शन कॉर्डियोलाजी में फ्री दे रही है।
इसे भी समझें
टेनेक्टेप्लेस इंजेक्शन का एक थ्रोम्बोलाइटिक दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके साल्ट को एंजाइम से लिया गया है और एक ऊतक प्लाज्मिनोजेन एक्टिवेटर है। मरीज के शरीर के वजन, स्वास्थ्य की स्थिति और बीमारी की गंभीरता के अनुसार डॉक्टर डोज तय करते हैं।
प्रो.एसके सिन्हा के अनुसार, जीवनरक्षक इंजेक्शन हर किसी को फायदा होगा, यह नहीं कहा जा सकता है। मोटे और दुबले-पतले का पैमाना अब बदल गया है। दुबले भी दमतोड़ रहे हैं, इसके लिए लाइफ स्टाइल एक बड़ी समस्या बन कर उभर रहा है। इंजेक्शन गोल्डेन समय के अंदर ही लगाया जाए तो कारगर होता है इसलिए लोगों को चाहिए कि हार्ट अटैक में देरी न करें और समय से संस्थान पहुंच जाएं तो उनकी जान बचाना डॉक्टरों के लिए भी आसान हो जाता है।

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