उत्तर प्रदेश में समीक्षा अधिकारी और सहायक समीक्षा अधिकारी परीक्षा-2023 को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। हाईकोर्ट द्वारा चयनित अभ्यर्थियों की ज्वाइनिंग पर अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग अब इस मामले में कानूनी तैयारी में जुट गया है। आयोग हरियाणा पब्लिक सर्विस कमीशन से जुड़े पुराने मामलों और उन पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेशों का अध्ययन कर रहा है। आयोग का मानना है कि प्रारंभिक परीक्षा सिर्फ स्क्रीनिंग के लिए होती है और अंतिम चयन मुख्य परीक्षा व इंटरव्यू के आधार पर तय किया जाता है।
प्रारंभिक परीक्षा पर आयोग का तर्क
आयोग के सचिव गिरिजेश त्यागी ने कहा कि प्रारंभिक परीक्षा केवल ‘सूटेबिलिटी एग्जाम’ होती है, जिसके अंक अंतिम मेरिट में नहीं जोड़े जाते। उन्होंने बताया कि आरक्षण का वास्तविक निर्धारण अंतिम चयन के दौरान लागू किया जाता है। आयोग का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही प्रारंभिक परीक्षा स्तर पर आरक्षण लागू करने के मुद्दे पर अंतरिम रोक से जुड़े संकेत दे चुका है। इसी आधार पर आयोग हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखेगा और बताएगा कि पूरी प्रक्रिया स्थापित नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के तहत पूरी की गई है।
ओबीसी चयन को बनाया बड़ा आधार
आयोग के मुताबिक 5 अप्रैल 2026 को जारी अंतिम परिणाम में कुल 419 अभ्यर्थियों का चयन हुआ था। इनमें 176 अभ्यर्थी ओबीसी वर्ग से थे। यानी कुल चयन में ओबीसी वर्ग की हिस्सेदारी करीब 42 प्रतिशत रही। आयोग का दावा है कि यह आंकड़ा साबित करता है कि चयन प्रक्रिया पूरी तरह समावेशी रही और सामाजिक न्याय का ध्यान रखा गया। आयोग ने यह भी कहा कि सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी 28.16 प्रतिशत रही, जिससे मेरिट और आरक्षण के बीच संतुलन साफ दिखाई देता है।
हाईकोर्ट में उठे आरक्षण के सवाल
कुछ अभ्यर्थियों ने अंतिम चयन सूची को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है। याचिकाओं में आरक्षण और माइग्रेशन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने फिलहाल चयनित उम्मीदवारों की ज्वाइनिंग पर अंतरिम रोक लगा दी है। इसके बाद आयोग अब अपने कानूनी पक्ष को मजबूत करने में जुट गया है। आयोग का कहना है कि अदालत में सभी तथ्यों और नियमों को विस्तार से रखा जाएगा ताकि चयनित अभ्यर्थियों को किसी तरह की परेशानी न हो।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर नजर
लोक सेवा आयोग इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पुरानी टिप्पणियों और आदेशों को अहम आधार मान रहा है। आयोग का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय पहले भी साफ कर चुका है कि प्रारंभिक परीक्षा स्तर पर आरक्षण के मुद्दे पर विस्तृत कानूनी परीक्षण जरूरी है। आयोग का दावा है कि पूरी भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी, नियमबद्ध और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप पूरी की गई है। अब सभी की नजर हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हुई है, जहां इस भर्ती प्रक्रिया का भविष्य तय हो सकता है।
