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गैजेट्स से बच्चों और युवाओं की आंखें हो रहीं बूढ़ीं

गैजेट्स से बच्चों और युवाओं की आंखें हो रहीं बूढ़ीं

जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र विभाग की ताजा स्टडी
-नवम्बर 2022 से दिसम्बर 2025 तक सात तक 27190 मरीज देखे गए
-7808 में मिली खराब आंखें,मायोपिया, हाइपर मेट्रोपिया, एस्टिग्मेटिज्म पाया गया।
-बच्चों और किशोरों में मायोपिया 38 फीसद से बढ़कर 57 फीसद पहुंचा
न्यूजप्लस डेस्क। राजेश द्विवेदी
एक जमाना रहा , जब 45 साल के बाद ही आंखों पर दूर हो या पास की नजरें कमजोर होने पर चश्मा लगता रहा है लेकिन अब गैजेट्स यानी मोबाइल, लैपटॉप और कम्प्युटरों के लगातार इस्तेमाल ने बच्चों और युवाओं की आंखों को समय से पहले बूढ़ा कर दिया है। बार-बार स्क्रीन एक्सपोजर के चलते समय से पहले ही आंखें मायोपिया, हाइपर मेट्रोपिया और एस्टिग्मेटिज्म की तेजी से शिकार हो रही हैं। तीन सालों में यह ग्राफ दोगुना तक बढ़ गया है।


इसका खुलासा जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र विभाग की ताजा स्टडी में हुआ है। नेत्र विभाग ने नवम्बर 2022 से दिसम्बर 2025 के बीच ओपीडी में आए 27190 मरीजों में पाया कि 7808 मरीजों में यानी 26 फीसद की आंखें समय से पहले बूढ़ी हो गईं हैं और उनकी आंखें बिना चश्मे के सही सलामत नहीं रह सकती हैं तो चश्मा लगाया गया। कोरोना काल से पहले यही ग्राफ सिर्फ सिर्फ 13 फीसद ही रिकार्ड किया गया है पर अब आंखों में मल्टीपल समय सामने आ रही हैं।
स्टडी में नेत्र विभाग के डॉक्टरों ने बीमार आंखों में 11 से 18 साल से कम के बच्चों को लिया जबकि उसके बाद 18 से 40 साल के युवाओं को लिया। विभाग ने मैनुअल के साथ आप्थेल्मोस्कोप से जांच की और फिर डॉटा का एकत्रीकरण किया। स्टडी े रिजल्ट ने खतरे की घंटी इस बात की बजाई है कि बच्चों और युवाओं को मायोपिया (यानी आंख में माइनस नंबर ) का ग्राफ तीन सालों में 38 से बढ़ कर 57 फीसद तक पहंुच गया है।
स्टडी के रिजल्ट यह भी रहे
-4495 मरीजों यानी 57 फीसद में मायोपिया पाया गया
-1634 मरीजों यानी 21 फीसद में हाइपरमेट्रोपिया (चश्मे का प्लस नंबर) पाया गया
-1473 मरीजों यानी 19 फीसद में एस्टिग्मेटिज्म (आंखों में सिले्ड्रिरकल समस्या ) पाया गया
-तीन फीसद मरीजों में मायोपिया के साथ एस्टिग्मेटिज्म भी पाया गया
-स्टडी का सार :
55 फीसद की आंखों में 11 से 40 साल की उम्र में ही चश्मा चढ़ गया।
-65 फीसद बच्चों में मायोपिया पाया गया
यह कारण सामने आए
-केस हिस्ट्री के आधार पर पाया गया कि बच्चे ही नहीं युवाओं का स्क्रीन एक्सपोजर मोबाइल, लैपटॉप , कम्प्युटर पर 7 से 13 घंटे तक पाया गया।
-सनलाइट एक्सपोजर यानी धूप की रोशनी लेने का समय एक से तीन घंटे ही पाया गया। सबकुछ नियर हाउस होता है।

-पहले यह कम से कम 6-7 घंटे रहा।

जिम्मेदार बोले-----
स्टडी ने पूरे विभाग को चौंका दिया है। पहली बार मायोपिया, हाइपर मेट्रोपिया और एस्टिग्मेटिज्म के मरीजों ने रिकार्ड तोड़ दिया है। आंखों की तीनों बीमारियां इतनी तेजी से बढ़ेंगी तो आने वाले कुछ ही सालों में एक बड़ी आबादी की आंखों पर चश्मा चढ़ जाएगा। इन बीमारियों के चलते भविष्य में जटिलताएं भी संभव है।

-प्रो. शालिनी मोहन ,नेत्र विभाग , जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज

इसे भी समझें
-मायोपिया यानी निकट दृष्टि (मायोपिक) आंख रेटिना के सामने दूर की वस्तु से किरणों को परिवर्तित करती है, जिसमें व्यक्ति केवल आस-पास की वस्तुओं पर ध्यान केंद्रित कर पाता।
-हाइपरमेट्रोपिया या दूरदृष्टि-दोष में निकट की वस्तुओं पर फ़ोकस करने में परेशानी होती है। बच्चों में काफी है।
-एस्टग्मिेटज्मि में आंखों की पुतली पूरी तरह गोल नहीं होने से दूरस्थ वस्तुएं धुंधली और दो आकार की दिखाई देने लगतीं हैं।

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