उत्तर प्रदेश की राजनीति में जिस फैसले का इंतजार कई दिनों से हो रहा था, उस पर आखिरकार तस्वीर साफ हो गई। 10 मई को हुए कैबिनेट विस्तार के बाद से ही चर्चा थी कि नए मंत्रियों को कौन सा विभाग मिलेगा और किन पुराने चेहरों का कद बढ़ेगा या घटेगा। करीब एक हफ्ते तक चले इंतजार के बाद विभागों का बंटवारा हुआ और इसके साथ ही तमाम राजनीतिक अटकलों पर विराम लग गया। लेकिन विभागों की सूची सामने आते ही नई चर्चाएं भी शुरू हो गईं।
मनोज पांडे बने सबसे बड़ी चर्चा
इस कैबिनेट विस्तार में सबसे ज्यादा चर्चा समाजवादी पार्टी से आए मनोज पांडे की हो रही है। उन्हें खाद्य एवं रसद तथा नागरिक आपूर्ति जैसा बड़ा विभाग सौंपा गया है। यह ऐसा विभाग माना जाता है जो सीधे जनता से जुड़ा रहता है। माना जा रहा है कि इस फैसले के जरिए सरकार ने एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। खासकर ब्राह्मण समीकरण और मिशन 2027 को लेकर इस फैसले के कई मायने निकाले जा रहे हैं।
भूपेंद्र चौधरी को क्या मिला
दूसरी तरफ बीजेपी के बड़े जाट चेहरे भूपेंद्र चौधरी को लेकर कई चर्चाएं चल रही थीं। माना जा रहा था कि उन्हें बड़ा और भारी विभाग मिल सकता है। लेकिन उन्हें सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम विभाग की जिम्मेदारी दी गई। हालांकि यह विभाग भी रोजगार और योजनाओं से जुड़ा अहम विभाग माना जाता है। इस विभाग के जरिए लाखों युवाओं और उद्योगों से सीधा संपर्क बना रहता है।
कई मंत्रियों को लगा झटका
विभागों के बंटवारे में कुछ पुराने मंत्रियों को बड़ा झटका भी लगा है। राकेश सचान से सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम विभाग लेकर भूपेंद्र चौधरी को दे दिया गया। इसी तरह दयालु मिश्र से खाद्य एवं रसद विभाग वापस लेकर मनोज पांडे को सौंप दिया गया। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज हो गई कि कुछ नेताओं का प्रभाव पहले की तुलना में कम हुआ है।
दिल्ली या योगी किसकी चली
विभाग बंटवारे से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दिल्ली यात्रा और बड़े नेताओं से मुलाकात काफी चर्चा में रही थी। ऐसे में कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे कि विभागों का फैसला दिल्ली से तय होगा। लेकिन अंतिम सूची आने के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा शुरू हो गई कि विभागों के बंटवारे में मुख्यमंत्री योगी की पसंद और रणनीति साफ दिखाई दी।
अब शुरू हुई नई चर्चा
फिलहाल विभागों के बंटवारे ने कई नए राजनीतिक संकेत दिए हैं। कुछ चेहरों का कद बढ़ता दिखा तो कुछ नेताओं को झटका भी लगा। लेकिन सबसे बड़ा संदेश यही माना जा रहा है कि यूपी की राजनीति में मिशन 2027 की तैयारी अब अंदरखाने तेजी से शुरू हो चुकी है और आगे कई नए समीकरण बनते दिखाई दे सकते हैं।
