आजकल हेल्थ इंश्योरेंस के विज्ञापनों में ‘अनलिमिटेड कवर’ शब्द बहुत आकर्षक तरीके से दिखाया जाता है। इसे देखकर लोगों को लगता है कि अब इलाज का पूरा खर्च बीमा कंपनी उठाएगी और जेब से एक भी रुपया नहीं देना पड़ेगा। लेकिन असलियत इतनी सीधी नहीं है। बीमा विशेषज्ञों के मुताबिक यह कई बार एक मार्केटिंग शब्द होता है, जिसे समझे बिना पॉलिसी लेना नुकसान का कारण बन सकता है।
रिफिल होता है कवर
असल में ‘अनलिमिटेड कवर’ का मतलब यह नहीं होता कि अस्पताल का हर बिल बिना शर्त पास हो जाएगा। इसका मतलब अक्सर यह होता है कि आपकी बीमा राशि जरूरत पड़ने पर दोबारा भर सकती है। उदाहरण के लिए अगर आपने 10 लाख रुपये का प्लान लिया और वह खर्च हो गया, तो कंपनी तय नियमों के अनुसार उसे फिर से सक्रिय कर सकती है। लेकिन इसका मतलब इलाज पूरी तरह मुफ्त होना नहीं है।
कमरे की शर्त बन सकती है परेशानी
कई हेल्थ पॉलिसियों में कमरे के किराए की सीमा तय होती है। अगर आपकी पॉलिसी में सिर्फ सामान्य निजी कमरे की अनुमति है और आप महंगा कमरा या सुइट लेते हैं, तो इसका असर पूरे बिल पर पड़ सकता है। कई बार कंपनी सिर्फ कमरे के किराए में ही नहीं, बल्कि डॉक्टर फीस और अन्य खर्चों में भी कटौती कर सकती है।
को-पेमेंट और छिपे खर्च
कुछ पॉलिसियों में को-पेमेंट की शर्त होती है। इसका मतलब इलाज के खर्च का एक हिस्सा आपको खुद देना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर अगर 10 लाख रुपये का बिल आता है और को-पेमेंट 10 प्रतिशत है, तो 1 लाख रुपये आपको अपनी जेब से देने पड़ सकते हैं। इसी तरह कई बीमारियों के लिए अलग सीमा भी तय रहती है।
सब लिमिट और डिडेक्टिबल समझें
मोतियाबिंद, पथरी या घुटने जैसे इलाज पर कई कंपनियां अलग सीमा तय कर देती हैं। अगर इलाज का खर्च तय सीमा से ज्यादा हुआ, तो बाकी रकम आपको देनी पड़ सकती है। कुछ पॉलिसियों में डिडेक्टिबल भी होता है, यानी शुरुआती खर्च पहले आपको खुद उठाना होता है और उसके बाद बीमा कंपनी भुगतान करती है।
पॉलिसी लेने से पहले करें जांच
विशेषज्ञ मानते हैं कि अनलिमिटेड कवर खराब विकल्प नहीं है, लेकिन आंख बंद करके भरोसा करना सही नहीं होगा। पॉलिसी लेने से पहले रूम रेंट, को-पेमेंट, डिडेक्टिबल और सब लिमिट जैसी शर्तों को जरूर समझना चाहिए। सिर्फ बड़े शब्द देखकर फैसला लेने के बजाय पूरी जानकारी के बाद ही बीमा चुनना बेहतर माना जाता है।
