उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले कांग्रेस ने नया सियासी दांव चल दिया है। पार्टी के नए प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस को एक मंच पर लाने की बात कही है। उनका कहना है कि संविधान बचाने की सोच रखने वाली सभी पार्टियों को साथ आना चाहिए। इसके बाद यूपी की राजनीति में गठबंधन को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
2019 का गठबंधन क्यों नहीं चला था?
सपा और बसपा 2019 के लोकसभा चुनाव में एक साथ चुनाव लड़ चुकी हैं। उस समय 'बुआ-बबुआ' गठबंधन को काफी मजबूत माना गया था, लेकिन नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आए। समाजवादी पार्टी पांच सीटों पर सिमट गई, जबकि बसपा को 10 सीटें मिलीं। इसके बावजूद बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने बड़ी जीत दर्ज की। चुनाव के बाद मायावती ने आरोप लगाया था कि बसपा का वोट सपा को मिला, लेकिन सपा का वोट बसपा को ट्रांसफर नहीं हुआ।
क्या इस बार साथ आ सकते हैं अखिलेश और मायावती?
मौजूदा राजनीतिक हालात में सपा और बसपा का फिर साथ आना आसान नहीं माना जा रहा है। दोनों दल लंबे समय से एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामक राजनीति करते रहे हैं। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद समाजवादी पार्टी खुद को मजबूत स्थिति में मान रही है। ऐसे में मुख्यमंत्री पद और सीट बंटवारे जैसे मुद्दे किसी भी संभावित गठबंधन के सामने बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
कांग्रेस की रणनीति क्या हो सकती है?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस इस बयान के जरिए सिर्फ गठबंधन की कोशिश नहीं कर रही, बल्कि समाजवादी पार्टी पर दबाव भी बनाना चाहती है। माना जा रहा है कि कांग्रेस 2027 के चुनाव में सीट शेयरिंग के दौरान ज्यादा हिस्सेदारी चाहती है। इसलिए बसपा का नाम लेकर सपा के साथ अपनी बातचीत की स्थिति मजबूत करने की कोशिश भी हो सकती है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
2019 के लोकसभा चुनाव में सपा, बसपा और आरएलडी के संयुक्त वोट प्रतिशत के बावजूद बीजेपी आगे रही थी। अगर उस समय कांग्रेस के वोट भी जोड़ दिए जाएं, तब भी विपक्ष बीजेपी से पीछे ही था। यही वजह है कि सिर्फ वोट जोड़ने से जीत की गारंटी नहीं मानी जा रही। राजनीतिक समीकरणों के साथ वोट ट्रांसफर और जमीनी तालमेल भी उतना ही अहम माना जाता है।
फिलहाल बयान ज्यादा, तस्वीर अभी साफ नहीं
कांग्रेस की ओर से गठबंधन की इच्छा जरूर सामने आई है, लेकिन अभी तक न समाजवादी पार्टी और न ही बहुजन समाज पार्टी ने इस पर कोई सहमति जताई है। ऐसे में फिलहाल इसे राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। 2027 के चुनाव में कौन किसके साथ जाएगा, इसका स्पष्ट जवाब आने वाले महीनों में ही सामने आएगा।
