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डिजिटल युग की दोधारी तलवार: महिलाओं के खिलाफ बढ़ती ऑनलाइन हिंसा

डिजिटल युग की दोधारी तलवार: महिलाओं के खिलाफ बढ़ती ऑनलाइन हिंसा

तकनीक आज महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा (VAWG – Violence Against Women and Girls) के संदर्भ में एक दोधारी तलवार बन चुकी है।
राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) के आँकड़ों के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच ऑनलाइन अपराधों में 118.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इनमें प्रमुख चार श्रेणियाँ हैं —

  1. ऑनलाइन बाल यौन शोषण और उत्पीड़न,
  2. सामूहिक बलात्कार और यौन उत्पीड़न से जुड़ी सामग्री,
  3. अश्लील कृत्य, और
  4. यौन रूप से आपत्तिजनक सामग्री का प्रसारण।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक, 2022 में केवल 14,409 मामले दर्ज किए गए, जबकि वास्तविक स्थिति इससे कहीं अधिक गंभीर है।
फिर भी, तकनीक-आधारित उपकरणों जैसे NCRP ने अपराधों की रिपोर्टिंग और डेटा एकत्र करने की प्रक्रिया को मजबूत किया है। वहीं, ‘सहयोग पोर्टल’ जैसे मंच गुमनाम रूप से शिकायत दर्ज कराने की सुविधा देते हैं, जिससे कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से सूचना प्राप्त कर सकती हैं।

बदलता तकनीकी परिदृश्य

तेज़ी से बदलती तकनीक ने हिंसा के नए रूप सामने लाए हैं — वर्चुअल रेप, AI-आधारित डीपफेक्स, और डार्क वेब पर अश्लील सामग्री का लेन-देन जैसी प्रवृत्तियाँ अब आम हो चली हैं।
इससे एक अहम सवाल उठता है:
क्या भारत के मौजूदा कानून और संस्थाएँ इन नई चुनौतियों से निपटने के लिए पर्याप्त रूप से मजबूत और संवेदनशील हैं?

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भारत का कानूनी ढाँचा

भारत में भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita) 2024, आईटी अधिनियम 2008, और POCSO अधिनियम 2012 में ऑनलाइन यौन उत्पीड़न, पीछा करना, झाँकना (voyeurism), और आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित करने जैसे अपराधों के लिए प्रावधान हैं।
आईटी नियम 2021 के तहत, इंटरनेट कंपनियों को गैर-सहमति वाली यौन छवियाँ 24 घंटे के भीतर हटानी होती हैं।

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भारत में केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर साइबर हिंसा से निपटने की व्यवस्था है —

4C,
930 हेल्पलाइन,
साइबर फॉरेंसिक लैब,
ऑनलाइन ट्रेनिंग प्लेटफ़ॉर्म (MOOC),
और राज्य स्तर के साइबर सेल।

कुछ राज्य जैसे केरल का CyberDome और तेलंगाना का Women Safety Wing बेहतर मॉडल पेश करते हैं, लेकिन इन पहलों की गुणवत्ता और नवाचार का स्तर राज्यों के बीच काफी भिन्न है।

विदेशी उदाहरण: अमेरिका का मॉडल

अमेरिका में 48 राज्यों में ‘Revenge Porn’ (बदला लेने के लिए साझा की गई अश्लील सामग्री) के खिलाफ कड़े कानून हैं, जो नागरिक और आपराधिक दोनों उपाय प्रदान करते हैं।
Cyberstalking को 18 U.S.C. § 2261A के तहत स्पष्ट रूप से अपराध माना गया है, जिससे एफबीआई को क्रॉस-स्टेट अधिकार प्राप्त होते हैं। कुछ राज्यों में ऑनलाइन उत्पीड़न के लिए विशेष प्रोटेक्टिव ऑर्डर भी दिए जाते हैं।

अमेरिका में FOSTA-SESTA (2018) कानून ने sex-trafficking सामग्री होस्ट करने वाले प्लेटफ़ॉर्म्स पर कार्रवाई संभव बनाई है।

संस्थागत रूप से, अमेरिका के पास भारत जैसी संरचनाएँ हैं —

FBI का Internet Crime Complaint Center (IC3),
Internet Crimes Against Children (ICAC) टास्क फोर्स,
और राज्य स्तर के CyberCrime Units।

इन सभी को VAWA (Violence Against Women Act) और OVM (Office on Violence Against Women) के तहत संघीय अनुदान से सहायता मिलती है।
नागरिक समाज और सरकार मिलकर ऑनलाइन सहायता और हेल्पलाइन ढाँचे को और मजबूत करते हैं।

अमेरिका में Public-Private Partnership (PPP) मॉडल ने न्याय प्रणाली को तकनीकी दृष्टि से उन्नत बनाया है।
स्टार्ट-अप्स और विश्वविद्यालय डीपफेक पहचानने वाले उपकरण विकसित कर रहे हैं, जिन्हें National Institute of Justice फंडिंग देता है।
युवा कार्यक्रमों, साइबरबुलिंग रोकथाम योजनाओं, और Office for Victims of Crime (OVC) के pilot projects के माध्यम से पीड़ितों को सहायता दी जाती है।

भारत की चुनौतियाँ

भारत में अब भी कई गंभीर खामियाँ मौजूद हैं —

कानून सामान्य और अस्पष्ट हैं, जिससे अपराधियों को सज़ा दिलाना कठिन होता है।
Revenge porn, deepfake, और doxxing जैसे अपराधों पर कोई अलग कानूनी प्रावधान नहीं है।
Cross-border crimes में अंतरराष्ट्रीय सहयोग धीमा और जटिल है।
आईटी अधिनियम की धारा 79 इंटरनेट कंपनियों को “सेफ हार्बर” देती है, जिससे वे सामग्री की सक्रिय निगरानी से बच जाती हैं।
एआई-जनित सामग्री, पीड़ित मुआवज़े या online restraining orders पर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं।
डेटा संरक्षण कानून का कमजोर प्रवर्तन स्थिति को और बिगाड़ता है।

आगे का रास्ता

जहाँ अमेरिका ने specific legislation और targeted institutions विकसित किए हैं, वहीं भारत का दृष्टिकोण अभी भी सामान्य और बिखरा हुआ है।
भारत को चाहिए कि वह —

नागरिक समाज और तकनीकी संस्थानों के साथ मजबूत साझेदारी करे,
सरकारी तंत्र में क्षमता-निर्माण बढ़ाए,
और टेक-सक्षम हिंसा पर केंद्रित स्वतंत्र संस्थाएँ स्थापित करे।

गोपनीयता की जगह पीड़ित की गोपनीय सुरक्षा और डेटा सुरक्षा कानूनों का सख्त पालन प्राथमिकता बननी चाहिए।

भारत जैसे विशाल इंटरनेट उपयोगकर्ता वाले देश में जन-जागरूकता, राज्य-स्तरीय बजट, और समुदाय की भागीदारी बेहद ज़रूरी है।
तकनीक जिस तेज़ी से बदल रही है, उसी रफ्तार से भारत को अपने कानूनों को अपडेट करना होगा —
जैसे घरेलू हिंसा अधिनियम, POCSO अधिनियम, और प्रस्तावित डिजिटल इंडिया बिल में स्पष्ट दंड और नागरिक उपाय तय किए जाएँ।

सबसे अंत में, हमें यह समझना होगा कि इस समस्या की जड़ सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक मानसिकता और लैंगिक शिक्षा की कमी है।
इस दिशा में सरकार, शिक्षण संस्थान, और समाज — सभी को मिलकर काम करना होगा ताकि इंटरनेट महिलाओं के लिए डर नहीं, सशक्तिकरण का माध्यम बन सके।

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