बढ़ती उम्र के साथ हाई बीपी और शुगर जैसी बीमारियां आम हो जाती हैं, लेकिन अब भूलने की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है। एक्सपर्ट के अनुसार 60 साल के बाद दिमाग की कार्यक्षमता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। ब्रेन के न्यूरॉन्स कमजोर होते हैं, जिससे नई चीजें याद रखने की क्षमता कम हो जाती है। यही कारण है कि बुजुर्ग अक्सर छोटी-छोटी बातें भूलने लगते हैं और यह समस्या धीरे-धीरे गंभीर रूप ले सकती है।
पहचान में देरी बनती है सबसे बड़ी वजह
एक्सपर्ट बताते हैं कि भूलने की बीमारी के लगभग 80 प्रतिशत मामलों में शुरुआती पहचान नहीं हो पाती। परिवार इसे सामान्य उम्र का असर मानकर नजरअंदाज कर देता है। लेकिन जब तक लक्षण स्पष्ट होते हैं, तब तक स्थिति काफी आगे बढ़ चुकी होती है। इसलिए जरूरी है कि शुरुआत में ही बदलावों को गंभीरता से लिया जाए और समय पर जांच कराई जाए।
लक्षणों को समझना है जरूरी
भूलने की बीमारी का असर सिर्फ याददाश्त तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव व्यवहार और मूड पर भी पड़ता है। बुजुर्ग चिड़चिड़े हो सकते हैं, बार-बार एक ही बात पूछ सकते हैं या रोजमर्रा के काम भूल सकते हैं। कई मामलों में लोग लंबे समय तक डिमेंशिया के साथ जीवन बिताते हैं। हालांकि यह बीमारी तुरंत जानलेवा नहीं होती, लेकिन सही समय पर इलाज जरूरी होता है।
डाइट और लाइफस्टाइल से मिल सकता है फायदा
अगर घर में किसी बुजुर्ग को याददाश्त से जुड़ी समस्या हो रही है तो डाइट पर खास ध्यान देना जरूरी है। एक्सपर्ट के अनुसार प्रोटीन और पोषण से भरपूर आहार बहुत जरूरी होता है। दाल, राजमा, सत्तू जैसे खाद्य पदार्थ नियमित रूप से दिए जाने चाहिए। साथ ही भारी और देर रात का भोजन करने से बचना चाहिए, क्योंकि इसका असर दिमाग और शरीर दोनों पर पड़ता है।
मेंटल हेल्थ का भी रखें ख्याल
सिर्फ खानपान ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही जरूरी है। बुजुर्गों को तनाव से दूर रखना चाहिए और उन्हें सामाजिक रूप से सक्रिय बनाए रखना चाहिए। हल्की एक्सरसाइज, बातचीत और परिवार के साथ समय बिताना उनके मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखता है।
समय पर कदम उठाना ही समाधान
अगर शुरुआती लक्षणों को पहचानकर समय पर इलाज शुरू किया जाए तो भूलने की बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। परिवार की जागरूकता और सही देखभाल ही इस समस्या से बचाव का सबसे बड़ा उपाय है।
