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काशी में दिव्य उत्सव: 5000 क्विंटल मिठाई से सजे मंदिर, मां अन्नपूर्णा को चढ़ा 511 क्विंटल भोग

काशी में दिव्य उत्सव: 5000 क्विंटल मिठाई से सजे मंदिर, मां अन्नपूर्णा को चढ़ा 511 क्विंटल भोग

दीपोत्सव की रौनक में डूबे प्राचीन नगरी काशी में बुधवार को अन्नकूट महोत्सव की भव्यता ने भक्तों का मन मोह लिया। गंगा तट से लेकर घाटों तक फैली इस आस्था की नगरी में 500 से अधिक छोटे-बड़े मंदिरों को करीब 5 हजार क्विंटल मिठाइयों से सजाया गया। लड्डुओं, पेड़ों और बर्फी के मानस भवनों से सजे ये मंदिर किसी स्वर्गीय दृश्य की तरह प्रतीत हो रहे हैं। विशेष रूप से मां अन्नपूर्णा मंदिर में 511 क्विंटल व्यंजनों का भोग अर्पित किया गया, जबकि भव्य शोभायात्रा में नरमुंडों पर सवार होकर मां चामुंडेश्वरी प्रकट हुईं, जो दर्शकों में भक्ति और भय का अनोखा संगम पैदा कर रही थीं। यह उत्सव न केवल अन्न-धन की देवी मां अन्नपूर्णा के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि काशी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण भी।

अन्नकूट का यह पर्व, जो गोवर्धन पूजा के रूप में भी जाना जाता है, भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत की रक्षा की कथा से प्रेरित है। काशी में यह उत्सव विशेष महत्व रखता है, जहां मंदिरों में 56 प्रकार के भोग चढ़ाए जाते हैं, जो प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और समृद्धि का प्रतीक हैं। सुबह से ही घाटों पर लाखों श्रद्धालु उमड़ पड़े। मंदिरों के द्वार खुलते ही भक्तों की लंबी कतारें लग गईं। मां अन्नपूर्णा मंदिर में स्वर्णमयी प्रतिमा के दर्शन के लिए रात से ही भक्त लाइन में खड़े थे। इस वर्ष धनतेरस से शुरू होकर अन्नकूट तक चले पांच दिवसीय दर्शन का समापन आज हुआ, जिसमें मां का 'खजाना' यानी विशेष सिक्के और प्रसाद भक्तों में वितरित किए गए।

मां अन्नपूर्णा मंदिर की बात करें तो यहां की भव्यता देखते ही बन रही थी। 105 कुशल कारीगरों ने रात-रात भर जागकर 511 क्विंटल प्रसाद तैयार किया। इसमें 57 प्रकार की मिठाइयां जैसे लड्डू, बर्फी, पेड़ा, रसगुल्ला और जलेबी शामिल हैं, जबकि 17 प्रकार की नमकीनें जैसे सेव, मठरी, भुजिया और चना जोर गरम ने भोग को और विविधता प्रदान की। कच्चे और पके व्यंजनों का यह संग्रह नेपाल, केरल और तमिलनाडु से मंगाए गए विशेष मसालों व घी से बनाया गया। मंदिर महंत शंकर पुरी ने बताया, "मां अन्नपूर्णा भक्तों पर अन्न-धन की वर्षा करती हैं। इस वर्ष हमने 511 क्विंटल से अधिक भोग तैयार कराया है, जो पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव को दी गई भिक्षा की याद दिलाता है। काशी में कोई भूखा नहीं सोएगा, यह हमारा संकल्प है।" मंदिर का गर्भगृह लड्डुओं से सजा हुआ था, और पूरा परिसर रंग-बिरंगे फूलों की मालाओं से महक रहा था। भोग अर्पण के बाद प्रसाद वितरण में हजारों भक्तों ने हिस्सा लिया, जो मां की कृपा का आशीर्वाद मानते हैं।

श्री काशी विश्वनाथ धाम में भी अन्नकूट की धूम रही। यहां 21 क्विंटल मिठाइयों और 56 प्रकार के व्यंजनों से बाबा विश्वनाथ का श्रृंगार किया गया। मंदिर प्रशासन ने स्वयं नमकीनें और मिठाइयां तैयार कराईं, जिसमें मठरी, सेव और विभिन्न मेवे शामिल थे। सुबह 4 बजे से शुरू हुए दर्शन शाम तक चले, जिसमें वीआईपी समय भी निर्धारित था। मंदिर के आसपास विद्युत झालरों और दीपमालिकाओं की चमक ने काशी को और निखार दिया। एक श्रद्धालु ने कहा, "बाबा के दरबार में अन्नकूट का दर्शन जीवन भर याद रहेगा। यह समृद्धि और भक्ति का संगम है।"

अन्य प्रमुख मंदिरों में भी भव्य भोग लगाए गए। दुर्गा मंदिर में 100 क्विंटल, रामनगर के राम मंदिर और गोपाल मंदिर में 51-51 क्विंटल, जबकि कालभैरव, बटुक भैरव और श्रीकृष्ण मंदिर में 21-21 क्विंटल का भोग चढ़ाया गया। दुर्गाकुंड स्थित मणि मंदिर (धर्मसंघ) में खास बात रही कि 5 हजार से अधिक घरों की रसोई से तैयार 151 क्विंटल प्रसाद अर्पित किया गया। यहां पहली बार मोटे अनाज जैसे बाजरा, कोदो, सांवां और मक्का से बने लड्डू चढ़ाए गए। महामंत्री पं. जगजीतन पांडेय ने कहा, "यह भोग भक्तों की श्रद्धा का प्रतीक है। 500 बटुकों ने गणेश वंदना की, जो उत्सव को और जीवंत बना दिया।" मंदिर में 101 क्विंटल का 56 भोग सजाया गया, जो पारंपरिक रीति से तैयार किया गया।

अन्नकूट का एक प्रमुख आकर्षण रही भव्य शोभायात्रा, जो काशी की सड़कों पर निकली। इसमें मां चामुंडेश्वरी नरमुंडों (कपाटों या प्रतीकात्मक खोपड़ियों) पर सवार होकर प्रकट हुईं, जो देवी के उग्र रूप को दर्शाता है। चामुंडा, जो महादेवी दुर्गा का एक रूप हैं, राक्षस चंड-मुंड का वध करने वाली योद्धा के रूप में जानी जाती हैं। यात्रा में मां काली का तांडव नृत्य और 'ऑपरेशन सिंदूर' की झांकी भी शामिल रही, जो समकालीन सामाजिक संदेश देती नजर आई। हजारों भक्तों ने यात्रा का स्वागत किया, ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते-गाते। यह शोभायात्रा काशी की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को एक सूत्र में बांधती है, जहां दक्षिण भारतीय देवी चामुंडेश्वरी का उत्तर भारतीय नगरी में स्वागत एक अनोखा संगम दिखाता है।

काशी के इस अन्नकूट ने न केवल धार्मिक उत्साह जगाया, बल्कि पर्यटन को भी बढ़ावा दिया। प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए, जिसमें वॉलेंटियर और पुलिस बल तैनात रहे। महंतों के अनुसार, यह पर्व पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है, क्योंकि कई मंदिरों में प्लास्टिक मुक्त पूजा की गई। भक्तों ने बताया कि मिठाइयों की यह बरसात समृद्धि की कामना को मजबूत करती है।

अन्नकूट के बाद प्रसाद वितरण से काशी की गलियां मिठास से भर गईं। हजारों जरूरतमंदों को भोजन वितरित किया गया, जो मां अन्नपूर्णा की अन्नदायिनी भावना को साकार करता है। यह उत्सव काशी को फिर साबित करता है कि यह नगरी केवल मंदिरों की नहीं, बल्कि जीवंत आस्था की राजधानी है। आने वाले वर्षों में भी यह परंपरा कायम रहेगी, भक्तों को नई ऊर्जा प्रदान करती हुई।

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