दुनियाभर में लीवर से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। The Lancet Gastroenterology & Hepatology में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, साल 2023 में करीब 1.3 अरब लोग ‘MASLD’ यानी मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज से प्रभावित थे। यह संख्या 1990 के मुकाबले लगभग 143 प्रतिशत अधिक है, जो एक गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा करती है।
2050 तक और बढ़ेगा खतरा
Global Burden of Disease Study 2023 के आंकड़ों के आधार पर किए गए इस अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि साल 2050 तक MASLD के मामले बढ़कर 1.8 अरब तक पहुंच सकते हैं। इसका मुख्य कारण बढ़ती आबादी, शहरीकरण और तेजी से बदलती जीवनशैली को माना गया है, जिसमें मोटापा और हाई ब्लड शुगर जैसी समस्याएं अहम भूमिका निभा रही हैं।
इन क्षेत्रों में ज्यादा असर
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व जैसे क्षेत्रों में इस बीमारी का प्रभाव सबसे ज्यादा देखा गया है। हालांकि इन इलाकों में मरीजों की संख्या अधिक है, लेकिन मृत्यु दर अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है। इसका कारण बेहतर इलाज और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार को माना जा रहा है, जिससे मरीज लंबे समय तक जीवित रह पा रहे हैं।
बीमारी के पीछे क्या हैं कारण
विशेषज्ञों के अनुसार, MASLD के मामलों में वृद्धि के पीछे सबसे बड़ी वजह जीवनशैली में बदलाव है। असंतुलित खानपान, फास्ट फूड का बढ़ता चलन, शारीरिक गतिविधियों की कमी और मोटापा इस बीमारी को बढ़ा रहे हैं। खास बात यह है कि अब यह समस्या सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही, बल्कि युवाओं में भी तेजी से फैल रही है, खासकर कम और मध्यम आय वाले देशों में।
भविष्य में गंभीर खतरे
हालांकि अभी इस बीमारी के कई मामले शुरुआती चरण में हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में इससे लिवर सिरोसिस और लिवर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए समय रहते इस पर ध्यान देना बेहद जरूरी है।
जागरूकता और नीतियों की जरूरत
शोधकर्ताओं का कहना है कि MASLD को अब वैश्विक स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके लिए सरकारों को जागरूकता अभियान, बेहतर नीतियां और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार पर जोर देना होगा। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में यह बीमारी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
