16 अप्रैल से शुरू हो रहे संसद के विशेष सत्र को लेकर सियासी माहौल गरमा गया है। केंद्र सरकार इस सत्र में परिसीमन से जुड़े अहम विधेयक पेश करने जा रही है। इनमें संविधान संशोधन के जरिए लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव शामिल है। साथ ही नए परिसीमन आयोग के गठन और चुनावी क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण की योजना भी है। लेकिन इन प्रस्तावों ने विपक्ष को पूरी तरह हमलावर बना दिया है।
विपक्ष का बड़ा विरोध
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने इस प्रस्ताव को अन्यायपूर्ण बताया है। उनका कहना है कि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का बंटवारा करने से दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व घट जाएगा। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी चेतावनी दी है कि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए।
चिदंबरम का गणित
कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने इस प्रस्ताव को भ्रम पैदा करने वाला बताया है। उनके अनुसार, तमिलनाडु की सीटें दिखने में बढ़ेंगी, लेकिन परिसीमन के बाद वास्तविक संख्या कम हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की सीटें काफी बढ़ जाएंगी, जिससे संसद में क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ सकता है।
सरकार का पक्ष क्या है
केंद्र सरकार का तर्क है कि वर्तमान सीटें 1971 की जनगणना के आधार पर तय हैं, जबकि देश की आबादी अब काफी बदल चुकी है। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि नए प्रस्ताव से हर राज्य को फायदा होगा और सीटों में आनुपातिक वृद्धि होगी। उन्होंने यह भी साफ किया कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए यह कदम जरूरी है और किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा।
दक्षिण बनाम उत्तर की बहस
इस पूरे मुद्दे ने दक्षिण और उत्तर भारत के बीच राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। विपक्ष का कहना है कि अगर सीटों का बंटवारा सिर्फ आबादी के आधार पर हुआ, तो दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक ताकत कमजोर हो सकती है। वहीं सरकार इसे देश की बदलती जरूरतों के मुताबिक जरूरी सुधार बता रही है।
आगे क्या होगा
संसद का यह विशेष सत्र काफी हंगामेदार रहने की उम्मीद है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ पूरी तैयारी में हैं। अब देखना होगा कि क्या सरकार इस विधेयक को पास करा पाती है या विपक्ष का विरोध इसे बड़ा सियासी मुद्दा बना देता है। आने वाले दिन देश की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।
