logo

header-ad
header-ad
क्यों मनाई जाती है नाग पंचमी, सनातन धर्म में क्या है इसका महत्व

क्यों मनाई जाती है नाग पंचमी, सनातन धर्म में क्या है इसका महत्व

नाग पंचमी हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व नाग देवताओं की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित है और भारत, नेपाल, बांग्लादेश सहित उन सभी देशों में उत्साह के साथ मनाया जाता है, जहां हिंदू, जैन और बौद्ध समुदाय निवास करते हैं। इस दिन भगवान शिव और नाग देवताओं की विशेष पूजा की जाती है, और मान्यता है कि यह पूजा सर्पदंश के भय से मुक्ति, सुख-समृद्धि और कालसर्प दोष के निवारण में सहायक होती है।

नाग पंचमी का इतिहास प्राचीन पौराणिक कथाओं से जुड़ा है, जिनमें से सबसे प्रसिद्ध कथा महाभारत काल से संबंधित है। भविष्य पुराण के अनुसार, राजा परीक्षित, जो अर्जुन के पौत्र थे, की मृत्यु तक्षक नाग के काटने से हुई थी। उनके पुत्र जनमेजय ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए एक सर्प यज्ञ (नाग दाह यज्ञ) का आयोजन किया, जिसमें सभी नाग यज्ञ की अग्नि में जलने लगे। इस यज्ञ को रोकने के लिए ऋषि आस्तिक, जो जरत्कारु मुनि के पुत्र थे, ने जनमेजय को समझाया और यज्ञ को बंद करवाया। यह घटना श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को हुई थी। यज्ञ की अग्नि को शांत करने के लिए आस्तिक मुनि ने नागों पर दूध डाला, जिससे नाग पंचमी पर दूध चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। इस दिन से नाग पंचमी का पर्व मनाया जाने लगा, जो नागों की रक्षा और उनके प्रति श्रद्धा का प्रतीक है।

एक अन्य कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान नागों ने अपनी माता की बात नहीं मानी, जिसके कारण उन्हें श्राप मिला कि वे जनमेजय के यज्ञ में जलकर भस्म हो जाएंगे। घबराए नागों ने ब्रह्माजी से मदद मांगी, जिन्होंने बताया कि आस्तिक मुनि उनकी रक्षा करेंगे। आस्तिक ने पंचमी तिथि को नागों को बचाया, और तभी से इस दिन को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है।

नाग पंचमी का महत्व

हिंदू धर्म में नागों को दिव्य और रहस्यमयी प्राणी माना जाता है। वे भगवान शिव के गले में वासुकि के रूप में और भगवान विष्णु की शय्या पर शेषनाग के रूप में विराजमान हैं।

मान्यता है कि इस दिन नाग देवताओं की पूजा करने से सर्पदंश का भय समाप्त होता है। यह विशेष रूप से सावन माह में महत्वपूर्ण है, जब बारिश के कारण सांप अधिक सक्रिय होते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष होता है, उनके लिए नाग पंचमी का दिन विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। इस दिन पूजा और मंत्र जाप से इस दोष का प्रभाव कम हो सकता है। नाग देवताओं की पूजा से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है। यह पर्व सभी प्राणियों में परमेश्वर के वास की भावना को भी प्रोत्साहित करता है। नाग खेतों में चूहों का सफाया कर फसलों की रक्षा करते हैं, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है। इस दिन उनकी पूजा प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक तरीका है।

नाग पंचमी की पूजा विधि

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पास के शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करें और उन्हें बेलपत्र अर्पित करें। घर के मुख्य द्वार पर गाय के गोबर या खड़िया से नाग की आकृति बनाएं। चांदी, लकड़ी, या मिट्टी से बनी नाग-नागिन की प्रतिमा को दूध और जल से स्नान कराएं। इसके बाद हल्दी, रोली, चावल, फूल, दही, दूर्वा, और मिठाई अर्पित करें। नाग देवताओं के आठ रूपों—अनंत, वासुकी, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कट, और शंख—का स्मरण करें। विशेष मंत्र जैसे "ॐ भुजंगेशाय विद्महे, सर्पराजाय धीमहि, तन्नो नाग: प्रचोदयात्" का जाप करें। पूजा के अंत में आरती करें और कथा सुनें। ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को दान दें, जैसे खीर, पूरी, या अन्य भोजन। शास्त्रों के अनुसार, नागों को दूध पिलाने के बजाय दूध से स्नान कराना चाहिए, क्योंकि दूध पिलाने से उनकी मृत्यु हो सकती है।

नाग पंचमी का रहस्य

नाग पंचमी का रहस्य इसकी पौराणिक और आध्यात्मिक गहराई में निहित है। हिंदू दर्शन में सांपों को केवल सरीसृप नहीं, बल्कि दैवीय शक्ति का प्रतीक माना गया है। कुछ कथाओं में कहा जाता है कि नागों के मस्तिष्क पर मणि होती है, जो अमूल्य होती है। यह मणि आत्मज्ञान और अध्यात्म का प्रतीक है, जो मनुष्य को जीवन में उच्च आदर्शों की ओर प्रेरित करती है।

नागों को एकांतवासी माना जाता है, जो मुमुक्षु (मोक्ष की इच्छा रखने वाले) के लिए एक उदाहरण है कि जनसमूह से दूरी बनाकर आत्मविकास पर ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा, नाग पंचमी का पर्व यह संदेश देता है कि सभी प्राणियों में परमेश्वर का वास होता है, और हमें उनके प्रति द्वेष या भय नहीं रखना चाहिए।

नाग पंचमी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त

वैदिक पंचांग के अनुसार, नाग पंचमी 2025 में 29 जुलाई, मंगलवार को मनाई जाएगी। पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 5:41 से 8:23 बजे तक रहेगा, जिसकी अवधि लगभग 2 घंटे 43 मिनट होगी। इस दिन सौभाग्य योग, शिव योग, और रवि योग जैसे शुभ संयोग बन रहे हैं, जो पूजा के प्रभाव को और बढ़ाएंगे।

Leave Your Comment