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अंग्रेजों ने अचानक क्यों छोड़ा भारत? स्वतंत्रता के पीछे छिपे असली कारण

अंग्रेजों ने अचानक क्यों छोड़ा भारत? स्वतंत्रता के पीछे छिपे असली कारण

देशभर मे कल मनाया जाएगा स्वतंत्रता दिवस, 79वां स्वतंत्रता दिवस भारत के गौरवशाली इतिहास, वर्तमान उपलब्धियों और भविष्य के सपनों का उत्सव है। यह दिन कोई आम दिन नही होता, इसके पीछे छुपा इतिहास देश की आजादी की कहानी रोमांचक और जटिल है। 15 अगस्त 1947 को जब भारत ने ब्रिटिश शासन से मुक्ति पाई, तो कई लोगों को यह फैसला अचानक लगा। लेकिन क्या वाकई यह अचानक था?

ऐतिहासिक तथ्यों और विशेषज्ञों के विचारों के आधार पर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की कमजोर अर्थव्यवस्था, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की तीव्रता, सैन्य विद्रोह और अंतरराष्ट्रीय दबाव जैसे कई कारकों ने मिलकर ब्रिटिश साम्राज्य को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 18वीं शताब्दी में भारत में व्यापार के बहाने पैर जमाए और धीरे-धीरे पूरे उपमहाद्वीप पर कब्जा कर लिया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (जिसे ब्रिटिश 'म्यूटिनी' कहते थे) के बाद सीधे ब्रिटिश क्राउन का शासन शुरू हुआ। 20वीं शताब्दी में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं के नेतृत्व में अहिंसक और सशस्त्र दोनों तरह के आंदोलन चले। लेकिन 1947 में आजादी का फैसला अप्रत्याशित रूप से तेजी से लिया गया। ब्रिटेन ने 1946 में ही घोषणा कर दी थी कि वह भारत को आजाद कर देगा, क्योंकि अब वह इस विशाल साम्राज्य को संभालने में सक्षम नहीं था।

द्वितीय विश्व युद्ध का निर्णायक प्रभाव

द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) ने ब्रिटेन को आर्थिक और सैन्य रूप से तोड़ दिया। युद्ध के दौरान ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा था – उसके जहाज डूबे, निर्यात घटा और वह अमेरिका से कर्ज पर निर्भर हो गया। युद्ध के बाद ब्रिटेन का राष्ट्रीय ऋण जीडीपी के 200% से अधिक पहुंच गया। भारत जैसे विशाल उपनिवेश को बनाए रखना अब असंभव हो गया था। ब्रिटेन को घरेलू मुद्दों जैसे स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) और कल्याण राज्य पर ध्यान देना था, जिसके लिए संसाधनों की जरूरत थी। विशेषज्ञों के अनुसार, युद्ध ने ब्रिटेन को इतना कमजोर कर दिया कि वह भारत जैसे बड़े साम्राज्य की रक्षा और प्रशासन नहीं कर सकता था। अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट ने भी ब्रिटेन पर दबाव डाला कि वह उपनिवेशवाद छोड़े, क्योंकि अटलांटिक चार्टर (1941) में स्व-निर्णय का वादा किया गया था।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की ताकत

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग जैसे संगठनों ने दशकों से संघर्ष किया। 1942 का 'भारत छोड़ो' आंदोलन हालांकि दबाया गया, लेकिन इसने भारतीयों में आजादी की उम्मीद जगा दी। गांधीजी की अहिंसा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटेन की छवि खराब की, जबकि सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज (आईएनए) ने ब्रिटिश सेना में विद्रोह की आग लगाई। आईएनए के अधिकारियों के मुकदमे ने पूरे भारत में हंगामा मचा दिया, और ब्रिटेन को लगा कि अब भारतीय सैनिकों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

1946 में रॉयल इंडियन नेवी का विद्रोह एक बड़ा कारण था। 78 जहाजों पर 20,000 नाविकों ने विद्रोह कर दिया, जो ब्रिटिश नियंत्रण की कमजोरी दिखाता था। ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने बाद में स्वीकार किया कि आईएनए और नौसेना विद्रोह ने भारत छोड़ने का फैसला तेज कर दिया। 1857 की यादें ताजा हो गईं, और ब्रिटेन को डर था कि अगर विद्रोह फैला तो वे और अधिक बल प्रयोग नहीं कर पाएंगे।

राजनीतिक परिवर्तन और विभाजन

1945 में ब्रिटेन में लेबर पार्टी की जीत के साथ एटली प्रधानमंत्री बने, जो उपनिवेशवाद के खिलाफ थे। लेकिन विभाजन का मुद्दा भी महत्वपूर्ण था। मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना ने अलग पाकिस्तान की मांग की, क्योंकि मुसलमानों को हिंदू बहुमत वाले भारत में डर था। 1946 की कलकत्ता हिंसा में 2,000 लोग मारे गए, जो सांप्रदायिक तनाव दिखाती थी। ब्रिटेन ने सोचा कि एकजुट भारत पर सहमति बनाने में समय लगेगा, इसलिए विभाजन एक 'तेज और सरल समाधान' लगा। लॉर्ड माउंटबेटन ने 1947 में सीमा तय की, और 15 अगस्त को आजादी दी गई।

अंतरराष्ट्रीय और आर्थिक दबाव

अमेरिका का दबाव निर्णायक था – रूजवेल्ट ने CHURCHILL को चेताया कि उपनिवेशवाद युग समाप्त हो रहा है। ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था इतनी कमजोर थी कि वह भारत की सेना और प्रशासन का खर्च नहीं उठा सकता था। युद्ध के बाद ब्रिटेन को अमेरिकी कर्ज चुकाने के लिए राशनिंग करनी पड़ी, और सर्दी 1946-47 में ईंधन की कमी ने स्थिति बिगाड़ दी।

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