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मौत के बाद नाक-कान में रुई क्यों लगाई जाती है, परंपरा के पीछे क्या है असली वजह?

मौत के बाद नाक-कान में रुई क्यों लगाई जाती है, परंपरा के पीछे क्या है असली वजह?

किसी व्यक्ति के निधन के बाद अंतिम संस्कार की तैयारी के दौरान नाक और कान में रुई लगाने की परंपरा अक्सर देखी जाती है। कई जगह मुंह के पास भी रुई रखी जाती है। इसे केवल धार्मिक रीति मान लिया जाता है, लेकिन इसके पीछे व्यावहारिक कारण भी जुड़े हैं। हालांकि हर जगह और हर परिस्थिति में यह जरूरी नहीं होता। अस्पताल, शवगृह और अंतिम संस्कार की व्यवस्था में स्थानीय नियमों और प्रशिक्षित कर्मचारियों की सलाह सबसे अहम होती है।

शरीर में शुरू होते हैं प्राकृतिक बदलाव

मृत्यु के बाद शरीर में प्राकृतिक बदलाव शुरू हो जाते हैं। मांसपेशियां ढीली पड़ सकती हैं और समय बीतने के साथ शरीर के भीतर मौजूद तरल पदार्थ बाहर आने की संभावना रहती है। खासकर नाक और मुंह से कुछ तरल या स्राव निकल सकता है। चिकित्सा भाषा में इसे शरीर के मृत्यु के बाद होने वाले बदलावों का हिस्सा माना जाता है। रुई या गॉज का इस्तेमाल ऐसे स्राव को सोखने और शरीर को साफ-सुथरा रखने के लिए किया जा सकता है।

रुई का मुख्य काम क्या होता है

नाक और कान में रुई लगाने का मुख्य उद्देश्य गैसों को पूरी तरह रोकना नहीं होता। यह दावा सही नहीं है कि रुई लगाने से शरीर के भीतर बनने वाली सारी गैसें बंद हो जाती हैं या संक्रमण फैलना पूरी तरह रुक जाता है। रुई का उपयोग मुख्य रूप से रिसाव या स्राव को संभालने और पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन या स्थानांतरण के लिए व्यवस्थित रखने में किया जाता है। अस्पतालों में जरूरत के हिसाब से रुई, गॉज या सोखने वाले पैड इस्तेमाल किए जाते हैं।

संक्रमण को लेकर क्या सच है

सामान्य स्थिति में मृत शरीर से संक्रमण फैलने का खतरा हर मामले में एक जैसा नहीं होता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि मौत किस कारण से हुई है। अगर किसी संक्रामक बीमारी का मामला हो तो स्वास्थ्यकर्मी अलग सुरक्षा नियम अपनाते हैं। ऐसे मामलों में दस्ताने, मास्क, शरीर को सुरक्षित ढंग से ढकना और तय प्रोटोकॉल का पालन जरूरी होता है। केवल नाक या कान में रुई लगा देने से संक्रमण से पूरी सुरक्षा नहीं मिलती।

धार्मिक मान्यता भी जुड़ी है

हिंदू परंपराओं में शरीर के खुले अंगों को ढकने या बंद करने की अलग-अलग मान्यताएं हैं। कई परिवार नाक, कान या मुंह के पास रुई या तुलसी का उपयोग श्रद्धा और अंतिम संस्कार की परंपरा के रूप में करते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में यह तरीका बदल सकता है। धार्मिक मान्यता का सम्मान जरूरी है, लेकिन इसे चिकित्सा नियम या वैज्ञानिक इलाज मानना सही नहीं होगा।

परिवार को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए

निधन के बाद परिवार को जल्दबाजी में कोई प्रक्रिया खुद करने के बजाय अस्पताल, शवगृह या अंतिम संस्कार सेवा से जुड़े प्रशिक्षित लोगों की मदद लेनी चाहिए। अगर मौत संदिग्ध हो, दुर्घटना हुई हो या पुलिस जांच चल रही हो तो शरीर के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। ऐसे मामलों में पुलिस और डॉक्टर के निर्देश जरूरी होते हैं। अंतिम समय में सबसे जरूरी बात यही है कि पार्थिव शरीर के साथ सम्मान बना रहे और परिवार को सही जानकारी के साथ मदद मिले।

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