देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की विचारधारा को लेकर नई बहस तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे दलों के सामने खड़े संकट को लेकर सवाल उठ रहा है कि क्या सत्ता में आने के बाद क्षेत्रीय पार्टियां अपने मूल मुद्दों से दूर हो जाती हैं। तेलुगु देशम पार्टी के नेता नारा लोकेश का मानना है कि यही दूरी कई दलों के लिए भारी पड़ रही है। उनका कहना है कि विचारधारा छोड़कर सिर्फ चुनावी समीकरणों पर टिकने वाली राजनीति लंबे समय तक नहीं चलती।
TMC पर आत्मसंतोष का आरोप
ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस लगातार लंबे समय से पश्चिम बंगाल की सत्ता में है। नारा लोकेश का दावा है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने से पार्टी के भीतर आत्मसंतोष बढ़ गया। उनका मानना है कि कार्यकर्ताओं से दूरी और मूल राजनीतिक संदेश कमजोर होने से संगठन पर असर पड़ता है। TMC की राजनीति कभी कांग्रेस विरोध और बंगाल की अस्मिता के इर्द-गिर्द बनी थी लेकिन अब उस पर वोट बैंक और सत्ता बचाने की राजनीति के आरोप लगते हैं।
AAP की सबसे बड़ी चुनौती
अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली थी। पार्टी ने साफ राजनीति और जवाबदेही के मुद्दे पर दिल्ली में बड़ी जीत हासिल की। लेकिन समय के साथ पार्टी पर आरोप लगने लगे कि वह अपने शुरुआती एजेंडे से दूर हो गई। 2025 में दिल्ली की सत्ता से बाहर होने के बाद AAP के सामने संगठन बचाने और अपनी पुरानी पहचान लौटाने की चुनौती है। सवाल यही है कि क्या आंदोलन की राजनीति सत्ता की राजनीति में बदल गई।
राहुल गांधी का अलग नजरिया
राहुल गांधी क्षेत्रीय दलों की विचारधारा को लेकर पहले भी सवाल उठा चुके हैं। राहुल गांधी का तर्क रहा है कि बीजेपी के वैचारिक मुकाबले के लिए मजबूत राष्ट्रीय विचारधारा चाहिए। उनका मानना है कि क्षेत्रीय दल अपने राज्यों में प्रभावी हो सकते हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी को चुनौती देने के लिए कांग्रेस जैसी विचारधारा जरूरी है। हालांकि 2024 के चुनाव में कांग्रेस को समाजवादी पार्टी जैसे क्षेत्रीय सहयोगियों से बड़ा राजनीतिक फायदा भी मिला।
TDP ने कैसे संभाला संकट
नारा लोकेश का कहना है कि TDP ने भी मुश्किल दौर देखा है लेकिन कार्यकर्ताओं और विचारधारा से जुड़ाव ने पार्टी को संभाल लिया। 2019 में पार्टी के कई सांसद बीजेपी में चले गए थे और TDP को बड़ा झटका लगा था। बाद में एन. चंद्रबाबू नायडू ने राजनीतिक समीकरण बदले और 2024 से पहले NDA में वापसी की। लोकेश इसे विचारधारा और संगठन के संतुलन का उदाहरण बताते हैं।
उद्धव और अखिलेश के सामने भी परीक्षा
उद्धव ठाकरे की राजनीति में हिंदुत्व और सत्ता गठबंधन का टकराव साफ दिखा। कांग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार बनाने के बाद शिवसेना में टूट हुई और संगठन का बड़ा हिस्सा अलग हो गया। वहीं अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी PDA राजनीति के जरिए अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। क्षेत्रीय दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे जाति धर्म और चुनावी समीकरणों से आगे जाकर अपनी स्थायी राजनीतिक पहचान कैसे बचाएं।
