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वक्फ संशोधन अधिनियम 2025: सुप्रीम कोर्ट ने तीन प्रावधानों पर लगाई रोक, पूरे कानून पर स्टे से इनकार

वक्फ संशोधन अधिनियम 2025: सुप्रीम कोर्ट ने तीन प्रावधानों पर लगाई रोक, पूरे कानून पर स्टे से इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने आज वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना अंतरिम फैसला सुनाया। कोर्ट ने पूरे कानून पर रोक लगाने से इनकार करते हुए इसके तीन प्रमुख प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाई है। यह फैसला मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और जस्टिस ए.जी. मसीह की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून पर रोक केवल "दुर्लभतम मामलों" में ही लगाई जा सकती है, और पूरे वक्फ अधिनियम पर स्टे लगाने का कोई आधार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति से संबंधित प्रावधान पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या तीन से अधिक और केंद्रीय वक्फ परिषद में चार से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि वक्फ बोर्ड का मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) मुस्लिम समुदाय से होना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं की दलीलें और कोर्ट की टिप्पणी

वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि इस कानून के कुछ प्रावधान संवैधानिक रूप से अवैध हैं और यह वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता को कमजोर करते हैं। याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से कलेक्टर की शक्तियों, गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति, और वक्फ संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे।

मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने कहा, "किसी भी कानून की संवैधानिकता के पक्ष में हमेशा एक अनुमान होता है, और हस्तक्षेप केवल अत्यंत दुर्लभ मामलों में ही किया जा सकता है। हमने प्रत्येक धारा पर प्रारंभिक चुनौती पर विचार किया और पाया कि पूरे अधिनियम पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं है।"

रोक लगाए गए तीन प्रावधान

  1. पांच साल तक इस्लाम का अनुयायी होने की शर्त:
    सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ अधिनियम के उस प्रावधान पर रोक लगा दी, जिसमें वक्फ संपत्ति बनाने या वक्फ बोर्ड का सदस्य बनने के लिए किसी व्यक्ति को कम से कम पांच साल तक इस्लाम का अनुयायी होना अनिवार्य था। कोर्ट ने कहा कि इस शर्त को लागू करने के लिए कोई स्पष्ट तंत्र या नियम नहीं है, जिसके अभाव में यह प्रावधान मनमाना हो सकता है। यह रोक तब तक लागू रहेगी जब तक सरकार इस संबंध में स्पष्ट नियम नहीं बनाती।
  2. कलेक्टर की शक्तियों पर रोक:
    कोर्ट ने उस प्रावधान को भी स्थगित कर दिया, जो जिला कलेक्टर को यह तय करने का अधिकार देता था कि कोई वक्फ संपत्ति सरकारी जमीन पर अतिक्रमण है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कलेक्टर को नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों का फैसला करने की शक्ति देना शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि वक्फ संपत्ति से संबंधित विवादों का निपटारा अब कलेक्टर के बजाय ट्रिब्यूनल द्वारा किया जाएगा।
  3. वक्फ संपत्ति के रजिस्ट्रेशन से संबंधित प्रावधान:
    सुप्रीम कोर्ट ने धारा 3(74) के तहत राजस्व रिकॉर्ड से जुड़े प्रावधान पर भी रोक लगाई। कोर्ट ने माना कि इस प्रावधान के तहत कार्यपालिका को मनमाने ढंग से अधिकार देने की संभावना है, जो व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन कर सकता है।

कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी का बयान

सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम फैसले का स्वागत करते हुए कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ कानून की आत्मा पर रोक लगाई है। यह फैसला मुस्लिम समुदाय के लिए राहत की बात है, क्योंकि यह कानून के उन प्रावधानों को स्थगित करता है जो मनमाने और असंवैधानिक थे।"

वक्फ कानून का महत्व और विवाद

भारत में वक्फ बोर्ड के पास लगभग 8.72 लाख एकड़ संपत्ति है, जो सेना और रेलवे के बाद देश में तीसरी सबसे बड़ी संपत्ति है। वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को लेकर व्यापक बहस छिड़ी थी, क्योंकि इसके कुछ प्रावधानों को मुस्लिम समुदाय और विपक्षी दलों ने उनके अधिकारों पर अतिक्रमण माना था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि यह अंतरिम आदेश वक्फ अधिनियम की वैधता पर अंतिम राय नहीं है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं और केंद्र सरकार की दलीलें सुनने के बाद यह फैसला लिया, जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र का पक्ष रखा।

अगली सुनवाई कब?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख तय नहीं की है, लेकिन यह स्पष्ट किया है कि जिन प्रावधानों पर रोक लगाई गई है, वे तब तक लागू नहीं होंगे जब तक सरकार स्पष्ट नियम और तंत्र विकसित नहीं करती। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह इस मामले में विस्तृत सुनवाई के दौरान सभी पक्षों की दलीलें सुनेगा। इस फैसले ने वक्फ कानून को लेकर चल रही बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। जहां एक ओर सरकार को पूरे कानून पर रोक न लगने से राहत मिली है, वहीं मुस्लिम समुदाय और याचिकाकर्ताओं ने कुछ प्रावधानों पर रोक को अपनी जीत के रूप में देखा है।

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