वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की कृष्ण अमावस्या को रखा जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य जीवन के लिए व्रत रखती हैं। मान्यता है कि मां सावित्री और वट वृक्ष की पूजा करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस व्रत में पूजा के साथ कुछ नियमों का पालन करना भी बहुत जरूरी माना जाता है।
मन और विचार रखें शांत
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट सावित्री व्रत के दिन मन में नकारात्मक विचार नहीं लाने चाहिए। क्रोध, ईर्ष्या, लालच और द्वेष जैसी भावनाओं से दूर रहने की सलाह दी जाती है। माना जाता है कि पूजा के समय मन शांत और सकारात्मक होना चाहिए, तभी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
इन चीजों से करें परहेज
व्रत के दिन बाल और नाखून काटना शुभ नहीं माना जाता। साथ ही काले, नीले और सफेद रंग के कपड़े पहनने से भी बचने की बात कही जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन साफ और शुभ रंगों के वस्त्र पहनना बेहतर माना जाता है। मैले कपड़े पहनना भी उचित नहीं माना जाता।
पति से विवाद न करें
मान्यता है कि इस दिन पति के साथ किसी भी प्रकार की बहस या नाराजगी से बचना चाहिए। उनके बारे में नकारात्मक बातें कहना या किसी से शिकायत करना भी शुभ नहीं माना जाता। व्रत का उद्देश्य वैवाहिक जीवन में प्रेम और सुख बनाए रखना होता है, इसलिए शांति और सम्मान का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
इन कामों को जरूर करें
सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद साफ वस्त्र पहनने चाहिए। सुहागिन महिलाओं के लिए सोलह श्रृंगार का भी विशेष महत्व बताया गया है। पूजा शुरू करने से पहले व्रत का संकल्प लेना चाहिए और उसके बाद मां सावित्री तथा वट वृक्ष की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए।
परिक्रमा और पारण नियम
पूजा के बाद कच्चे सूत या कलावे से वट वृक्ष की परिक्रमा की जाती है। मान्यता के अनुसार 5, 7, 11, 21 या 108 बार धागा लपेटा जा सकता है। व्रत का पारण अगले दिन किया जाता है और चने का सेवन करके व्रत खोलने की परंपरा बताई गई है। इसलिए चनों को पहले से भिगोकर रखना अच्छा माना जाता है।
