ईरान और अमेरिका के बीच बनी अस्थायी सहमति को लेकर अब तक कतर के अमीर और पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही थी। लेकिन अब सामने आई रिपोर्टों ने पूरी कहानी का नया पहलू खोल दिया है। दावा किया जा रहा है कि इस कूटनीतिक प्रक्रिया के असली सूत्रधार संयुक्त अरब अमीरात के प्रभावशाली कारोबारी और शाही परिवार के सदस्य शेख तहून बिन जायद अल नाहयान थे। माना जा रहा है कि उनकी सक्रिय भूमिका ने बातचीत को आगे बढ़ाने और कई अड़चनों को दूर करने में अहम योगदान दिया।
जब बातचीत अटक गई थी
रिपोर्ट के अनुसार ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत की शुरुआत अप्रैल में हुई थी। उस समय कतर और पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे थे। हालांकि कई मुद्दों पर सहमति नहीं बन पा रही थी और वार्ता आगे नहीं बढ़ रही थी। इसी दौरान यूएई की भूमिका सामने आई। कहा जा रहा है कि बाद में शेख तहून बिन जायद अल नाहयान को बातचीत में सक्रिय जिम्मेदारी दी गई, जिसके बाद घटनाक्रम तेजी से बदलने लगा।
ईरान से रिश्ते सुधारना बना टर्निंग पॉइंट
बताया जाता है कि नाहयान ने सबसे पहले ईरान के शीर्ष नेतृत्व से संपर्क साधा और दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की कोशिश की। इसके बाद खाड़ी देशों के बीच समन्वय बढ़ा। इसी प्रक्रिया ने आगे चलकर अमेरिका और ईरान के बीच संवाद का रास्ता आसान बनाया। रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि क्षेत्रीय स्तर पर बने नए माहौल ने समझौते की संभावनाओं को मजबूत किया।
खाड़ी देशों ने बढ़ाया दबाव
ईरान और यूएई के रिश्तों में सुधार के बाद कई खाड़ी देशों ने एक साझा रुख अपनाया। इसके बाद अमेरिका पर भी समझौते को आगे बढ़ाने का दबाव बढ़ा। माना जा रहा है कि क्षेत्र में बढ़ते तनाव, ऊर्जा बाजार की चिंता और आर्थिक प्रभावों ने भी इस प्रक्रिया को गति दी। इसी वजह से बातचीत को नई दिशा मिली और अस्थायी सहमति का रास्ता तैयार हुआ।
इजराइल भी हुआ अलग-थलग
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा असर क्षेत्रीय राजनीति पर भी पड़ा। यूएई और ईरान के बीच बढ़ती बातचीत ने मध्य पूर्व के समीकरण बदल दिए। कई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इस प्रक्रिया के दौरान इजराइल खुद को अपेक्षाकृत अलग स्थिति में महसूस कर रहा है। यही कारण है कि इस समझौते को सिर्फ अमेरिका और ईरान की डील नहीं बल्कि पूरे मध्य पूर्व की बदलती राजनीति के रूप में देखा जा रहा है।
अब आगे क्या होगा?
अस्थायी सहमति के बाद अब दोनों देशों के बीच स्थायी समझौते पर बातचीत होने की संभावना है। अमेरिका की प्राथमिकता परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट आश्वासन हासिल करना है, जबकि ईरान अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखना चाहता है। ऐसे में आने वाले दिनों की वार्ताएं तय करेंगी कि यह समझौता कितनी दूर तक जाता है। फिलहाल इतना जरूर है कि जिस नाम की चर्चा सबसे कम थी, वही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा किरदार बनकर सामने आया है।
