अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एक सोशल मीडिया पोस्ट शेयर कर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। इस पोस्ट में भारत और चीन को ‘हेलहोल’ यानी बेहद खराब जगह बताया गया। यह पोस्ट एक कंजरवेटिव पॉडकास्ट होस्ट की थी, जिसमें अमेरिका के जन्म के आधार पर नागरिकता देने वाले कानून की आलोचना की गई। बयान सामने आते ही सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई और इसे भारतीयों के प्रति नकारात्मक नजरिए से जोड़कर देखा जाने लगा।
बर्थराइट सिटिजनशिप पर उठे सवाल
इस पोस्ट में कहा गया कि प्रवासी अमेरिका में बच्चों को जन्म देकर उन्हें नागरिकता दिलाते हैं और फिर अपने परिवार को भी वहां बुला लेते हैं। डोनाल्ड ट्रंप और उनके समर्थक लंबे समय से इस नियम का विरोध करते रहे हैं। उनका मानना है कि नागरिकता का फैसला अदालतों के बजाय जनता के वोट से होना चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर अमेरिका में राजनीतिक बहस लगातार तेज हो रही है।
भारतीय आबादी बनी चर्चा का कारण
इस पूरे विवाद के पीछे अमेरिका में तेजी से बढ़ती भारतीय आबादी भी एक अहम वजह मानी जा रही है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है और वे वहां दूसरी सबसे बड़ी एशियाई आबादी बन चुके हैं। पिछले दो दशकों में भारतीय समुदाय की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है, जिससे उनकी आर्थिक और सामाजिक भूमिका भी मजबूत हुई है।
तेजी से बढ़ी भारतीयों की मौजूदगी
साल 2000 के मुकाबले 2023 तक अमेरिका में भारतीयों की आबादी में करीब 174 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी वहां बस चुके हैं और अब उनके परिवार भी अमेरिका में जन्म लेकर नागरिक बन रहे हैं। यही कारण है कि बर्थराइट सिटिजनशिप को लेकर विवाद और ज्यादा गहरा हो गया है।
भाषा और पहचान को लेकर दावा
पोस्ट में यह भी दावा किया गया कि अमेरिका में अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल कम हो रहा है और पहचान बदल रही है। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि भारतीय मूल के ज्यादातर लोग अंग्रेजी अच्छी तरह बोलते हैं और समाज में अच्छी तरह घुले-मिले हैं। घर में भले अलग-अलग भाषाएं बोली जाती हों, लेकिन सार्वजनिक जीवन में अंग्रेजी का उपयोग सामान्य है।
कानूनी लड़ाई और आगे का रास्ता
अमेरिका में जन्म के आधार पर नागरिकता का अधिकार 1868 के 14वें संशोधन से मिला है। डोनाल्ड ट्रंप ने इस नियम को बदलने की कोशिश भी की थी, लेकिन मामला अभी अदालतों में लंबित है। आने वाले समय में यह मुद्दा अमेरिकी राजनीति का बड़ा चुनावी एजेंडा बन सकता है, जिसका असर प्रवासी समुदाय, खासकर भारतीयों पर भी पड़ सकता है।
