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क्रांति के वो शेर… जिन्होंने आज़ादी की नींव रखी

क्रांति के वो शेर… जिन्होंने आज़ादी की नींव रखी

15 अगस्त, 1947 को भारत ने ब्रिटिश शासन की बेड़ियों को तोड़कर आज़ादी की सैर की। यह दिन केवल एक तारीख नहीं, बल्कि उन अनगिनत वीरों की गाथा है जिन्होंने अपने खून, पसीने और बलिदान से स्वतंत्रता की नींव रखी। आज, जब हम 79वें स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मना रहे हैं, उन क्रांतिकारी शेरों को याद करना जरूरी है जिनके साहस और समर्पण ने भारत को आज़ादी दिलाई।

भगत सिंह: क्रांति की चिंगारी

23 साल की उम्र में फांसी के फंदे को चूमने वाले भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रखर नायक थे। "इंकलाब जिंदाबाद" का नारा बुलंद करने वाले इस युवा ने 1928 में लाहौर में सांडर्स की हत्या और 1929 में दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंककर ब्रिटिश शासन को हिला दिया। उनका मकसद हिंसा नहीं, बल्कि जनता को जागृत करना था। भगत सिंह ने कहा था, "बहरों को सुनाने के लिए ऊँची आवाज़ की जरूरत होती है।" उनकी शहादत ने लाखों युवाओं को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया।

चंद्रशेखर आज़ाद: आज़ादी का अटल योद्धा

"दुश्मन की गोलियों का सामना हम करेंगे, आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे।" यह वचन था चंद्रशेखर आज़ाद का, जिन्होंने कभी गुलामी की जंजीरें स्वीकार नहीं कीं। काकोरी कांड के बाद हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के नेतृत्व में आज़ाद ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सशस्त्र क्रांति को तेज किया। 1931 में इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश पुलिस से घिरने के बाद भी उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया और अपनी अंतिम गोली खुद के लिए रखी।

सुभाष चंद्र बोस: नेताजी का जुनून

"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा।" नेताजी सुभाष चंद्र बोस का यह नारा आज भी हर भारतीय के दिल में जोश भर देता है। आज़ाद हिंद फौज के गठन के साथ, नेताजी ने ब्रिटिश साम्राज्य को बाहर से चुनौती दी। 1943 में सिंगापुर में "दिल्ली चलो" का आह्वान करते हुए उन्होंने भारतीयों को एकजुट किया। उनकी रणनीति और नेतृत्व ने आज़ादी की लड़ाई को वैश्विक मंच पर ले जाकर ब्रिटिश शासन को कमजोर किया।

रानी लक्ष्मीबाई: झाँसी की शेरनी

1857 की क्रांति की मशाल बनकर उभरीं झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने न केवल अपने राज्य की रक्षा की, बल्कि पूरे देश को प्रेरित किया। "मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी" कहकर उन्होंने ब्रिटिश सेना का डटकर मुकाबला किया। घोड़े पर सवार, तलवार थामे और अपने पुत्र को पीठ पर बांधे रानी ने वीरता की ऐसी मिसाल कायम की, जो आज भी गर्व का प्रतीक है। 1858 में ग्वालियर में उनकी शहादत ने स्वतंत्रता की लौ को और तेज किया।

लाला लाजपत राय: पंजाब केसरी

"लाठी मेरी बस्ती की, औ' भारत में भीड़" - लाला लाजपत राय ने ब्रिटिश अत्याचारों के खिलाफ जनता को संगठित किया। साइमन कमीशन के विरोध के दौरान 1928 में लाठीचार्ज में घायल होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उनकी मृत्यु ने देश में आक्रोश की आग भड़काई, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी।

स्वतंत्रता संग्राम केवल कुछ नामों तक सीमित नहीं था। मंगल पांडे, जिन्होंने 1857 की क्रांति की शुरुआत की, से लेकर राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्लाह खान, सुखदेव, राजगुरु, और बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी। साथ ही, गाँधीजी के अहिंसक आंदोलन में शामिल लाखों भारतीयों ने भी आज़ादी की नींव को मजबूत किया।

आज जब हम स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, इन वीरों की कुर्बानी को याद करना हमारा कर्तव्य है। उनकी लड़ाई केवल गुलामी से मुक्ति के लिए नहीं थी, बल्कि एक ऐसे भारत के लिए थी, जो समृद्ध, समान और स्वाभिमानी हो। हमें उनके सपनों को साकार करने के लिए एकजुट होकर काम करना होगा।इन क्रांतिकारी शेरों की गाथा हर भारतीय के दिल में हमेशा जिंदा रहेगी। उनकी वीरता और बलिदान हमें याद दिलाते हैं कि आज़ादी अनमोल है, और इसे बनाए रखने की जिम्मेदारी हमारी है।

जय हिंद!

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