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भारत से होगा अगला दलाई लामा! चीन क्यों कर रहा अवतार पर हस्तेक्षप

भारत से होगा अगला दलाई लामा! चीन क्यों कर रहा अवतार पर हस्तेक्षप


14वें तिब्बती बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा तेमजिन ग्यात्सो 90 साल के हो चुके हैं, इसके साथ नए दलाई लामा को लेकर चर्चा तेज हो गई है। 90 साल के होते ही उन्होंने एक ऐसी घोषणा कर दी जिससे माना जाने लगा कि अगला दलाई लामा भारत से हो सकता है, उन्होंने साफ कहा कि उनका उत्तराधिकारी लोकतांत्रिक और स्वतंत्र देश से होगा। साफ है वह तिब्बत और चीन नहीं हो सकते क्योंकि तिब्बत पर चीन का कब्जा है और दलाई लामा चीन को लोकतांत्रिक देश नहीं मानते।

चीन ने दलाई लामा के चुनाव में हस्तक्षेप की कोशिश की तो खुद दलाई लामा का बयान सामने आया, उन्होंने चीन को न केवल फटकारा बल्कि साफ कर दिया कि उत्तराधिकारी गादेन फोडरंग ट्रस्ट पूरी प्रक्रिया के तहत अगला दलाई लामा चुनेगा। यह प्रक्रिया दलाई लामा की मृत्यु के बाद उनके अवतार को खोजने से शुरू होती है, माना जाता है दलाई लामा पुनर्जन्म लेते हैं। उनके अवतार के खोज बौद्ध भिक्षुओं के दल हिमालय की वादियों में करते हैं। इधर चीन ने ऐलान किया है कि चीनी सरकार से मान्यता वाला ही दलाई लामा होगा, इससे दलाई लामा के चुनाव पर विवाद खड़ा हो गया है।


कैसे होता दलाई लामा का चुनाव
दलाई लामा का चुनाव कोई सामान्य चुनाव प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह एक आध्यात्मिक खोज होती है। दलाई लामा के अगले अवतार (पुनर्जन्म) की पहचान तिब्बती बौद्ध परंपरा के अनुसार की जाती है। इसमें किसी तिथि या समय की घोषणा नहीं होती, बल्कि यह एक लंबी धार्मिक प्रक्रिया होती है।


दलाई लामा के चुनाव की प्रक्रिया
वर्तमान दलाई लामा का निधन होने के बाद उनकी अगली देह में पुनर्जन्म की खोज शुरू होती है। तिब्बती बौद्ध भिक्षु और धार्मिक नेता विभिन्न संकेतों, स्वप्नों और पवित्र झीलों के दर्शन के माध्यम से यह पता लगाते हैं कि अगला दलाई लामा कहां पैदा हुआ है। एक बच्चा जो विशेष लक्षणों को प्रदर्शित करता है, उसकी पहचान एक संभावित दलाई लामा के रूप में होती है। उस बच्चे की परीक्षा ली जाती है, जैसे पूर्व दलाई लामा की वस्तुओं को पहचानना आदि। जब पुष्टि हो जाएगी तो उसे आधिकारिक रूप से 14वें दलाई लामा के उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता दी जाएगी है।


मौजूदा स्थिति
1935 जन्मे 14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो अभी जीवित हैं और सक्रिय हैं। उन्होंने कहा था कि वे 90 वर्ष की उम्र के करीब पहुंचकर यह निर्णय करेंगे कि अगला दलाई लामा होगा या नहीं। अब उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के बारे में सब कुछ साफ कर दिया है। चीन और तिब्बती सरकार-इन-एक्साइल के बीच इस विषय पर विवाद है, क्योंकि चीन अपने अनुसार दलाई लामा घोषित करना चाहता है। दलाई लामा का चुनाव कब होगा,यह फिलहाल तय नहीं है। यह तब तय होगा जब वर्तमान दलाई लामा का या तो निधन होगा या स्वयं पुनर्जन्म की प्रक्रिया के बारे में दिशा-निर्देश देंगे।


क्यों दलाई लामा का इतना महत्व
दलाई लामा केवल एक धार्मिक नेता नहीं, बल्कि माने जाते हैं। उनका महत्व धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और वैश्विक स्तर पर बेहद व्यापक है।


धार्मिक महत्व
दलाई लामा को गेलुग परंपरा का सर्वोच्च लामा माना जाता है। बौद्ध मान्यताओं के अनुसार दलाई लामा करुणा के देवता अवलोकितेश्वर का अवतार हैं। वे लोगों को मोक्ष, अहिंसा और करुणा का मार्ग दिखाते हैं।


शांति और अहिंसा का प्रतीक
दलाई लामा महात्मा गांधी के सिद्धांतों से प्रभावित होकर अहिंसात्मक संघर्ष के समर्थक हैं। वह तिब्बत की स्वतंत्रता के बजाय सार्थक स्वायत्तता की मांग करते हैं। 1989 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया।


वैश्विक आध्यात्मिक नेता
दुनिया भर में दलाई लामा को बौद्धों के साथ-साथ अन्य धर्मों के लोग भी सम्मान देते हैं। वे धर्मनिरपेक्ष नैतिकता, करुणा, सहिष्णुता, आंतरिक शांति पर जोर देने के साथ युवाओं को ध्यान और सकारात्मक सोच की प्रेरणा देते हैं।


तिब्बती पहचान के संरक्षक
तिब्बत से निर्वासन के बाद उन्होंने भारत के धर्मशाला में तिब्बती सरकार-इन-एग्जाइल स्थापित की। उनके नेतृत्व में तिब्बत एक वैश्विक मुद्दा बना, जिसे पहले पहुत कम लोग जानते थे।


राजनीतिक ताकत
1950 के पहले तक दलाई लामा तिब्बत के धार्मिक और राजनीतिक दोनों नेता होते थे। 2011 में उन्होंने औपचारिक रूप से राजनीतिक भूमिका छोड़ दी, जिससे तिब्बती लोकतांत्रिक व्यवस्था को बल मिला।


तिब्बत पर चीन की नियंत्रण की कोशिश
1950में चीन ने तिब्बत पर सैन्य कार्रवाई की और 1951 में जबरन उसे चीन में मिला लिया। 1959 में दलाई लामा भारत आ गए और धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में तिब्बती सरकार-इन-एक्साइल की स्थापना की। चीन तब से दलाई लामा और उनके प्रभाव को खतरा मानता है।


चीन अपना दलाई लामा घोषित करना चाहता
चीन चाहता है कि जब वर्तमान दलाई लामा का देहांत हो, तो वह अपनी पसंद का एक बच्चा चुनकर उसे अगला दलाई लामा घोषित करे। इसके लिए उसने पहले भी पंचेन लामा की नियुक्ति में हस्तक्षेप किया था। असली पंचेन लामा को गायब कर दिया गया और उसकी जगह चीन ने खुद का पंचेन लामा नियुक्त किया।


धार्मिक नियंत्रण का राजनीतिक मकसद
चीन चाहता है कि धर्म भी पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में रहे, ताकि लोगों में अलगाववादी भावना न पनपे। यदि चीन अपना दलाई लामा घोषित कर दे तो वह तिब्बत में लोगों को यह दिखा सकता है कि सब कुछ नियमित और वैध तरीके से चल रहा है।


दलाई लामा की प्रतिक्रिया
14वें दलाई लामा ने साफ किया है कि चीन को दलाई लामा के चुनाव में कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। उन्होंने संकेत दिया है कि अगला दलाई लामा भारत या किसी अन्य देश में पुनर्जन्म ले सकता है, जिससे चीन की योजना विफल हो सकती है।


दलाई भारत में क्यों रहते
वर्तमान दलाई लामा (14वें), तेनजिन ग्यात्सो इस समय भारत के हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रह रहे हैं। उन्होंने 1959 में तिब्बत से भागकर भारत में शरण ली थी, और तब से यहीं रह रहे हैं।


क्यों छोड़ना पड़ा तिब्बत
1950 में चीन ने तिब्बत पर हमला कर दिया और उसे "पीसफुल लिबरेशन" कहकर चीन में मिला लिया। इसके बाद तिब्बत में धीरे-धीरे चीन का सैन्य और प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ता गया। 1959 में लाखों तिब्बती लोगों ने चीनी शासन के खिलाफ बगावत कर दी। चीनी सेना ने इस विद्रोह को कुचल दिया और हालात इतने खराब हो गए कि दलाई लामा को जान बचाकर भागना पड़ा।


भारत ने दी शरण
भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दलाई लामा को मानवीय आधार पर शरण दी थी। दलाई लामा भारत आए और तब से धर्मशाला में रह रहे हैं, जहां उन्होंने तिब्बती सरकार-इन-एक्साइल की स्थापना भी की।


वर्तमान स्थिति
दलाई लामा आज भी धर्मशाला में रहते हैं। यहीं पर तिब्बती निर्वासित प्रशासन का मुख्यालय है। यह जगह अब तिब्बती संस्कृति, शिक्षा और धर्म का वैश्विक केंद्र बन चुकी है।


क्यों नहीं लौटते तिब्बत
तिब्बत अब पूरी तरह चीनी सेना और प्रशासन के अधीन है। वहां बौद्ध भिक्षुओं और मंदिरों पर सख्त सरकारी निगरानी है। यदि दलाई लामा तिब्बत लौटते हैं, तो उन्हें गिरफ्तार या नियंत्रित किया जा सकता है। भारत में रहकर वे तिब्बती संस्कृति और धार्मिक परंपरा को सुरक्षित रख पा रहे हैं।

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