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शहीद क्रांतिकारियों की अमर गाथा... शहादत से आजादी तक की लड़ाई

शहीद क्रांतिकारियों की अमर गाथा... शहादत से आजादी तक की लड़ाई

  • "गुलामी की जंजीरों को तोड़कर… जिन्होनें फहराया तिरंगा"
  • हिंदुस्तान को ‘माँ’ कहने वाला सच्चा बेटा…
  • दोस्ती जो फांसी तक अमर रही"…

15 अगस्त आज़ादी का त्योहार, लेकिन ये सिर्फ जश्न का दिन नहीं ये उन अनगिनत बलिदानों को याद करने का दिन है, जिनकी वजह से ये देश आज़ाद हवा में सांस ले रहा है शहीद ये शब्द सुनते ही आंखों में गर्व के आंसू आ जाते हैं दिल में एक अजीब सी लहर दौड़ जाती है आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं 15 क्रांतिकारियों की वो अमर कहानियां जो सिर्फ इतिहास की किताबों में नहीं बल्कि आज भी हर भारतीय के खून में बहती हैं, ये वो नाम हैं जिन्होंने आज़ादी की कीमत अपने लहू से चुकाई…

1 भगत सिंह

एंकर - भगत सिंह… सिर्फ एक नाम नहीं, एक विचार है… 13 अप्रैल 1919… जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद… महज 12 साल के भगत सिंह ने तय कर लिया था कि आज़ादी अहिंसा के रास्ते नहीं, बल्कि क्रांति से आएगी… 1928 में लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अंग्रेज अफसर जॉन सॉन्डर्स को गोली मार दी… फिर 8 अप्रैल 1929… दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंके… बम से किसी की जान नहीं गई… क्योंकि ये हिंसा नहीं, एक संदेश था… इंकलाब जिंदाबाद का संदेश…. भगत सिंह जानते थे कि उनकी लड़ाई अदालत में नहीं, बल्कि जनता की अदालत में लड़ी जाएगी…. और वो लड़े भी…… लेकिन 23 मार्च 1931… शाम के 7 बजे… लाहौर की जेल …फांसी का दिन जब आया… तो भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु हंसते हुए फांसी के फंदे पर चढ़ गए… उनके होंठों पर आखिरी शब्द थे इंकलाब जिंदाबाद…..

2 चंद्रशेखर आज़ाद

एंकर - चंद्रशेखर तिवारी… जिन्होंने खुद को 15 साल की उम्र में ही आज़ाद' नाम दे दिया…उन्होंने कसम खाई थी… दुश्मन के हाथ जिंदा नहीं आएंगे… 27 फरवरी 1931… इलाहाबाद का अल्फ्रेड पार्क… पुलिस ने घेर लिया… अकेले आज़ाद ने घंटों गोलियां चलाईं…. जब आखिरी गोली बची… तो उन्होंने वो गोली खुद पर चला दी… गिरते-गिरते मुस्कुराए… और कहा…. आज़ाद था… आज़ाद रहूंगा….

3 राजगुरु

"एंकर - शिवराम हरि राजगुरु… महज 22 साल की उम्र… लेकिन अंग्रेजों के दिल में दहशत का नाम…. उनकी निशानेबाजी की कला इतनी अद्भुत थी कि सॉन्डर्स कांड में उन्होंने पहली ही गोली में लक्ष्य ढेर कर दिया… भगत सिंह और सुखदेव के साथ फांसी के फंदे पर झूलते हुए राजगुरु ने कहा था देश के लिए मरना मेरा सौभाग्य है….

4 सुखदेव थापर

एंकर - सुखदेव थापर… क्रांति की रीढ़ की हड्डी… हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के मुख्य सदस्य… अंग्रेजों के खिलाफ असेंबली बम कांड से लेकर सॉन्डर्स कांड तक हर योजना के मास्टरमाइंड… मौत की सजा सुनते ही उन्होंने कहा था हमारी शहादत नई पीढ़ी को जगाएगी….

5 खुदीराम बोस : सबसे कम उम्र के शहीद

एंकर - खुदीराम बोस… 18 साल की उम्र में फांसी का फंदा चूमने वाले क्रांतिकारी…. 30 अप्रैल 1908… मुजफ्फरपुर बम कांड… अंग्रेज अफसर को मारने की कोशिश में बम फट गया… जिसमें दो यूरोपीय महिलाएं मारी गईं…. अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार किया… और 11 अगस्त 1908 को फांसी दे दी…. फांसी पर जाते हुए खुदीराम मुस्कुरा रहे थे… और गा रहे थे वंदे मातरम….

6 रानी लक्ष्मी बाई

एंकर - 1857… भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम और इस संग्राम की सबसे चमकदार तलवार थीं… रानी लक्ष्मी बाई… जिन्होनें कहां था मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी… ये सिर्फ एक वाक्य नहीं… बल्कि वो कसम थी जो रानी ने अंग्रेज़ों के सामने खाई…. ग्वालियर की रणभूमि पर घोड़े बादल पर सवार होकर…. उन्होंने आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी और जब उन्होंने प्राण त्यागे…. तो हर हिंदुस्तानी के दिल में विद्रोह की आग भड़क उठी…..

7 विनायक दामोदर सावरकर

एंकर - अंग्रेजों ने जिनसे सबसे ज्यादा डर महसूस किया… वो थे विनायक दामोदर सावरकर… लंदन में पढ़ते हुए उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन की नींव रखी।… अभिनव भारत संगठन से लेकर 1857 का स्वातंत्र्य समर जैसी पुस्तक तक… उनका हर शब्द आज़ादी का पैगाम था…. अंग्रेजों ने उन्हें काला पानी की सज़ा दी… लेकिन अंदमान की कालकोठरी भी उनकी कलम और विचारों को कैद नहीं कर सकी….

8 बाल गंगाधर तिलक

एंकर - बाल गंगाधर तिलक ने कहा था स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा … तिलक ने जनता के दिलों में स्वराज की लौ जलाई…. उन्होंने गणेशोत्सव और शिवाजी जयंती को जन आंदोलन का रूप दिया… अंग्रेजों के खिलाफ उनके भाषण और लेख केसरी अखबार से गूंजते रहे और वो खुद इस आज़ादी की मशाल के प्रहरी बन गए….

9 लाला लाजपत राय

एंकर - लाला लाजपत राय… जिनको पंजाब केसरी कहा जाता था… 1928 में जब अंग्रेजों ने साइमन कमीशन को भेजा…. तो उन्होंने उसका डटकर विरोध किया… लाठीचार्ज में घायल होने के बाद भी उन्होंने कहा था मेरे शरीर पर पड़ी हर चोट अंग्रेज़ी हुकूमत के ताबूत की कील बनेगी… और सच में उनकी शहादत ने पूरे देश में बगावत की आग लगा दी….

10 दुर्गा देवी वोहरा
एंकर - आज़ादी की लड़ाई सिर्फ पुरुषों ने नहीं लड़ी… दुर्गा देवी वोहरा…. वो वीरांगना थीं जिन्होंने भगत सिंह और राजगुरु को पुलिस की गिरफ्त से बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी…. वो असेंबली बम कांड के बाद भगत सिंह को ट्रेन में अपने साथ ले गईं…. ताकि अंग्रेज़ उनकी पहचान न कर सकें…. उन्होंने साबित किया कि स्वतंत्रता का संघर्ष सिर्फ एक जंग नहीं… बल्कि त्याग और साहस का प्रतीक है….

11 सुभाष चंद्र बोस
एंकर - सुभाष चंद्र बोस… नेताजी… जिनकी गूंज तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा…. ये नारा आज भी दिलों में जिंदा है… सन् 1945… एक विमान ताइवान की ओर उड़ान भरता है… और खबर आती है… नेताजी का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया… लेकिन… मौत की ये खबर आज तक रहस्य है… क्या नेताजी सच में शहीद हो गए… या कोई और अध्याय अभी भी अनकहा है….लेकिन जो सच है… वो ये है कि नेताजी ने ब्रिटिश साम्राज्य को हिलाकर रख दिया था….

12 मंगल पांडे

एंकर - 1857… भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम…मंगल पांडे जो 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के एक साधारण सिपाही थे… लेकिन दिल में थी आज़ादी की आग… जब अंग्रेज़ों ने गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूस देने की ज़बरदस्ती की…. तो मंगल पांडे ने बंदूक उठा ली… और 29 मार्च 1857 को बैरकपुर में चली वो गोली… जो पूरे देश में बग़ावत की चिनगारी बन गई… वो फांसी चढ़े… लेकिन क्रांति की नींव रख गए….

13 बटुकेश्वर दत्त
एंकर - 1929… दिल्ली की सेंट्रल असेंबली…बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह ने बम फोड़ा… पर ये बम किसी को मारने के लिए नहीं था… बल्कि अंग्रेज़ों को ये बताने के लिए था… कि अब भारत की आवाज़ दबाई नहीं जा सकती… जिसके बाद इंकलाब ज़िंदाबाद की गूंज पूरे देश में फैल गई… बटुकेश्वर दत्त को उम्रकैद मिली… उन्होनें जेल में यातनाएं झेलीं… और आज़ादी के बाद भी वो गुमनामी में जीते रहे….

14 राम प्रसाद बिस्मिल
एंकर - 1925… काकोरी रेलवे स्टेशन… हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारी…. राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला खान और उनके साथियों ने अंग्रेज़ों की सरकारी ट्रेन लूटी… ताकि आज़ादी की लड़ाई के लिए हथियार खरीदे जा सकें…. राम प्रसाद बिस्मिल…जो कवि, क्रांतिकारी, और निडर योद्धा था… अशफ़ाकउल्ला खान…. मुसलमान होकर भी हिंदुस्तान को माँ कहने वाला सच्चा बेटा था… दोनों अलग धर्म के थे… लेकिन दोस्ती इतनी गहरी थी कि फांसी का फ़ैसला भी दोस्ती को न तोड़ सका…. 19 दिसंबर 1927 को… राम प्रसाद बिस्मिल गोरखपुर जेल में और अशफ़ाकउल्ला खान फैजाबाद जेल में फांसी पर चढ़ा दिए गए…

15 उधम सिंह
एंकर - 13 अप्रैल 1919… जलियांवाला बाग… हजारों बेगुनाह गोलियों की बारिश में ढेर कर दिए गए… इस खून की नदी में एक नौजवान के दिल में बदले की आग जल उठी… नाम था उधम सिंह…. जिन्होनें 21 साल बाद… लंदन में माइकल ओ’ड्वायर पर गोलियों की बौछार करदी…. जिसके बाद इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया इंकलाब का बदला… 31 जुलाई 1940… पेंटनविले जेल में … उधम सिंह को फाँसी दी गई… लेकिन हिंदुस्तान को मिल चुका था अपना शहीद-ए-आजम…

ये सिर्फ नाम नहीं… ये वो कहानियाँ हैं… जिनके हर पन्ने में खून की महक और मातृभूमि का जुनून बसा है… ये वो चेहरे हैं… जिन्होंने आज़ादी के रंग में अपना लहू घोल दिया… ताकि हम और आप… बिना बेड़ियों के सांस ले सकें… 15 अगस्त… आज़ादी का दिन है… लेकिन क्या ये सिर्फ एक तारीख है… या ये उन चीखों, उन हंसी के ठहाकों, और उन फाँसियों के तख्तों की याद है… जिन पर चढ़ते वक्त भी क्रांतिकारी बोले थे… इंक़लाब ज़िंदाबाद…… जरा सोचिए… जब 15 अगस्त की सुबह, सूरज की पहली किरण हमारे तिरंगे पर पड़ती है… तो उसके पीछे कितनी अनगिनत कुर्बानियों की लाली छुपी होती है… ये आज़ादी… हमें यूं ही नहीं मिली… किसी ने अपने सपनों की क़ुर्बानी दी…. किसी ने अपनी जवानी की… और किसी माँ ने अपने लाल की… इन क्रांतिकारियों के घर अक्सर चूल्हा ठंडा रहा… क्योंकि घर का कमाने वाला… देश के लिए शहीद हो चुका था… और आज… जब हम खुलकर सांस लेते हैं… जब तिरंगा खुलकर लहराता है… तो उसमें सिर्फ रंग नहीं… उन माँओं के आंसू, बहनों की सिसकियां, और पत्नियों के टूटे सपने भी शामिल होते हैं… ये आज़ादी सिर्फ़ एक तोहफ़ा नहीं… ये वो अमानत है… जो हमें उन लोगों ने दी है जिन्होंने खुद के कल को मिटाकर… हमारा आज बनाया… तो आओ… इस 15 अगस्त पर सिर्फ़ खुशियां न मनाएं…. बल्कि उन शहीदों और उनके परिवारों को दिल से सलाम करें… जिनकी कुर्बानियों पर हमारा हिंदुस्तान खड़ा है… क्योंकि देश की आज़ादी… हर हिंदुस्तानी का सबसे बड़ा गर्व है।

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