चांदी के दामों में हालिया उछाल ने निवेशकों के दिलों में उम्मीद जगाई है, लेकिन वैश्विक बाजारों में बढ़ती अस्थिरता ने एक सवाल खड़ा कर दिया है—क्या 1980 की तरह फिर से कोई बड़ा क्रैश हो सकता है? चार दशक पहले, अमेरिकी अरबपति हंट ब्रदर्स की साजिश ने चांदी के बाजार को हिला दिया था। जनवरी 1980 में चांदी के भाव 50 डॉलर प्रति औंस (लगभग 12,800 रुपये प्रति किलोग्राम) तक पहुंच गए थे, लेकिन 'सिल्वर थर्सडे' यानी 27 मार्च को सब कुछ बदल गया। एक हफ्ते में भावों में करीब 25,000 रुपये प्रति किलोग्राम की भारी गिरावट आई, जिसने हजारों निवेशकों को बर्बाद कर दिया। आज, जब चांदी के दाम 54 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड हाई छूने के बाद 6% लुढ़क चुके हैं और लंदन में 'पैनिक' की स्थिति है, तो विशेषज्ञ आगाह कर रहे हैं कि इतिहास खुद को दोहरा सकता है।
1980 का काला अध्याय
1970 के दशक के अंत में, तेल संकट और मुद्रास्फीति की मार झेल रही अमेरिकी अर्थव्यवस्था में चांदी एक सुरक्षित निवेश बन गई थी। टेक्सास के तेल किंग नेल्सन बंकर हंट और उनके भाई विलियम हर्बर्ट हंट (जिन्हें हंट ब्रदर्स के नाम से जाना जाता है) ने मौके का फायदा उठाया। इन दोनों अरबपतियों ने चांदी के फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स खरीदना शुरू किया, साथ ही भौतिक चांदी का भंडार जमा किया। उनका मकसद था बाजार को 'कॉर्नर' करना—यानी इतना स्टॉक कंट्रोल करना कि बाकी खरीदारों को मजबूरन ऊंचे दाम चुकाने पड़ें।
1979 तक, हंट ब्रदर्स ने चांदी की वैश्विक सप्लाई का करीब 200 मिलियन औंस (लगभग 6,200 टन) खरीद लिया था, जो बाजार के एक तिहाई के बराबर था। नतीजा? चांदी के दाम 6 डॉलर प्रति औंस से उछलकर जनवरी 1980 में 50 डॉलर तक पहुंच गए। भारत में, जहां चांदी आभूषण और सिक्कों के लिए महत्वपूर्ण है, भाव 2,500 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 12,000-13,000 रुपये हो गए। लेकिन यह बुलबुला ज्यादा दिन नहीं टिका।
कमोडिटी एक्सचेंज (कॉमेक्स) ने हंट ब्रदर्स की बढ़ती पोजीशन को खतरा महसूस किया। 27 मार्च 1980 को, एक्सचेंज ने नियम बदल दिए—फ्यूचर्स में लॉन्ग पोजीशन की सीमा तय कर दी और मार्जिन कॉल्स बढ़ा दिए। हंट ब्रदर्स के पास 1.7 बिलियन डॉलर का कर्ज था, जिसे चुकाने के लिए उन्हें चांदी बेचनी पड़ी। नतीजा? एक ही दिन में भाव 21 डॉलर से गिरकर 10.80 डॉलर रह गए। अगले हफ्ते में गिरावट और तेज हुई—भारत में प्रति किलोग्राम 25,000 रुपये तक की कमी दर्ज की गई, क्योंकि डॉलर-रुपये का एक्सचेंज रेट 8 के आसपास था। हंट ब्रदर्स दिवालिया हो गए, और अमेरिकी सरकार को 1 बिलियन डॉलर का बैलआउट पैकेज देना पड़ा। यह घटना 'सिल्वर थर्सडे' के नाम से कुख्यात हो गई, जो बाजार मैनिपुलेशन का क्लासिक उदाहरण बनी।
आज का बाजार
आज, 22 अक्टूबर 2025 को चांदी का स्पॉट प्राइस 49.87 डॉलर प्रति औंस (लगभग 1,50,000 रुपये प्रति किलोग्राम) पर स्थिर है, लेकिन यह शांति धोखे वाली है। तीसरी तिमाही में भाव 36 डॉलर से उछलकर 54 डॉलर के रिकॉर्ड हाई पर पहुंचे, लेकिन 19 अक्टूबर को 6% की गिरावट ने निवेशकों को हिलाकर रख दिया। भारत में, दिवाली की खरीदारी के बाद भाव 7,000 रुपये गिरे, लेकिन कुल मिलाकर साल भर में 44% की तेजी रही।
इस उछाल के पीछे कई कारक हैं। सबसे बड़ा है ग्रीन एनर्जी बूम—सोलर पैनल्स में चांदी का इस्तेमाल 2025 में 20% बढ़ा है। सिल्वर इंस्टीट्यूट के अनुसार, वैश्विक डिमांड 1.2 बिलियन औंस पार कर गई, जबकि सप्लाई 1 बिलियन औंस से कम है। सातवें साल लगातार डेफिसिट है। भारत, दुनिया का सबसे बड़ा चांदी खरीदार, ने इस साल 4,000 टन आयात किया, जिससे लंदन के वेयरहाउस खाली हो गए। 'ग्लोबल सिल्वर स्क्वीज' की स्थिति बन गई है—फिजिकल डिलीवरी के ऑर्डर बढ़े, लेकिन स्टॉक नहीं। लंदन में पैनिक सा माहौल है, जहां ट्रेडर्स 1980 की याद ताजा कर रहे हैं।
क्रैश का खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि 1980 जैसा क्रैश दोहराने के लिए कुछ शर्तें जरूरी हैं—अत्यधिक स्पेकुलेशन, रेगुलेटरी हस्तक्षेप और लिक्विडिटी क्राइसिस। आज ETF और फ्यूचर्स ट्रेडिंग ने बाजार को और जटिल बना दिया है। सिल्वर ETF हाल ही में 19% गिरे, लेकिन एनालिस्ट्स कहते हैं कि यह 'रिसेट' हो सकता है, न कि क्रैश। लोबो टिग्रे जैसे विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर स्टॉक मार्केट क्रैश होता है, तो मार्जिन कॉल्स से चांदी बिकवाली बढ़ सकती है, जैसा 1980 में हुआ।
हालांकि, अंतर भी हैं। आज का बाजार ज्यादा रेगुलेटेड है—सीईटीसी और एसईसी जैसी एजेंसियां मॉनिटरिंग करती हैं। चांदी अब सिर्फ ज्वेलरी नहीं, बल्कि इंडस्ट्री (इलेक्ट्रॉनिक्स, मेडिकल) का हिस्सा है, जो डिमांड को स्थिर रखती है। फिर भी, जियोपॉलिटिकल टेंशन—चीन-अमेरिका ट्रेड वॉर और मिडिल ईस्ट अस्थिरता—भावों को अस्थिर बना रही हैं। अगर सोलर बूम धीमा पड़ता है या रिसेशन आता है, तो 10-15% की गिरावट संभव है।
भारतीय निवेशकों के लिए सलाह: छोटे-मोटे निवेश से बचें। विशेषज्ञ सुझाते हैं कि लॉन्ग-टर्म होल्डिंग करें, क्योंकि 2025 में डेफिसिट बरकरार रहेगा। लेकिन याद रखें, 1980 ने सिखाया कि लालच बाजार को निगल सकता है।
इतिहास न दोहराएं
1980 का क्रैश चांदी को 30 साल पीछे धकेल गया था। आज, जब बाजार 'ब्रोकेन' लग रहा है, तो निवेशक सावधान रहें। क्या यह 1980 का दोहराव होगा? शायद नहीं, लेकिन जोखिम हमेशा बना रहता है। बाजार की नब्ज पकड़ें, विविधीकरण अपनाएं। चांदी चमकती तो है, लेकिन कभी-कभी जल्दी भी बुझ जाती है।



