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काशी की रामलीला: गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल, देशभर में मुस्लिम समाज का अहम योगदान

काशी की रामलीला: गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल, देशभर में मुस्लिम समाज का अहम योगदान

वाराणसी की सांस्कृतिक विरासत में रामलीला एक ऐसा समारोह है जो सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और सशक्त सहअस्तित्व का प्रतीक बन चुका है। खासकर लाट भैरव की रामलीला, जहाँ हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदायों के कलाकार एक मंच पर आकर भूमिका निभाते हैं यही गंगा-जमुनी तहजीब की अटूट गाथा है।

लाट भैरव मंदिर के प्रांगण में हर साल रामलीला का मंचन होता है। इस स्थान की विशेषता यह है कि मंचन के दौरान एक ओर नमाज की अजान गूंजती है और दूसरी ओर रामलीला के पात्र अपनी अभिनय कला में खो जाते हैं। इस दृश्य को देखना एक गवाह बनना है उस आदर्श का, जिसमें धर्म और संस्कृति एक दूसरे का साथ देते हैं। रामलीला की इस परंपरा की शुरुआत कई सदियों पहले हुई थी, और आज भी वह उतनी ही गर्व से आयोजित की जाती है।

सामूहिक योगदान और तालमेल

इस रामलीला में न केवल हिन्दू कलाकार मुख्य भूमिकाएँ निभाते हैं, बल्कि मुस्लिम कलाकार भी अन्य किरदारों या मंडली कार्यों में शामिल होते हैं। जैसे नमाजी, जो अपनी नमाज अदा करने में लगे रहते हैं, जबकि रामलीला के कलाकार पीछे मंच पर अपनी भूमिकाएँ कर रहे होते हैं। इस तरह दोनों पक्षों का एक दूसरे के प्रति सम्मान और समझ स्थापित होती है।

विविधता में एकता का संदेश

काशी की इस रामलीला ने यह साबित किया है कि धार्मिक भिन्नता स्वयं में बाधा नहीं, बल्कि सौन्दर्य है। जब एक ही जगह नमाज की पुकार और रामचरितमानस की व्याख्या साथ-साथ हो सकती है, तब हम यह देख पाते हैं कि समाज में असहिष्णुता नहीं, बल्कि सहिष्णुता कभी-कभी फिर भी सीमाओं के भीतर जीवित हो सकती है। इस तरह, वाराणसी की रामलीला न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि वह एक प्रतीक है उस संस्कृति का, जहाँ भिन्नताएँ संगती हैं और स्वर मिल जाते हैं। यह हमें याद दिलाती है कि असली शक्ति अलगाव में नहीं, बल्कि साथ मिलकर रहने में है।

आपको बता दें रामलीला के मंचन में हिन्दू कलाकार मुख्य भूमिकाएँ निभाते हैं, वहीं मुस्लिम कलाकार भी विभिन्न किरदारों और तकनीकी कार्यों में शामिल होते हैं। पंडाल सजाने, लाइट-साउंड व्यवस्था, वेशभूषा और मेकअप तक में मुस्लिम कारीगर अहम भूमिका निभाते हैं।

देशभर में मुस्लिम समाज का सहयोग

काशी की ही तरह पूरे देश में रामलीला का आयोजन होता है और मुस्लिम समाज इसमें अलग-अलग रूपों में जुड़ा रहता है।

  • दिल्ली (रामलीला मैदान, लालकिला) – यहाँ की रामलीला में मुस्लिम कारीगर हर साल पंडाल और मंच की सजावट करते हैं। कई मुस्लिम परिवार पीढ़ियों से रामलीला कमेटी से जुड़े हुए हैं।
  • लखनऊ – नवाबी तहजीब की झलक वाली रामलीला में मुस्लिम कलाकार ‘हनुमान’ और ‘मेघनाद’ जैसे किरदार निभा चुके हैं। साथ ही, यहाँ की रामलीला में तलवार और धनुष-बाण बनाने वाले मुस्लिम लोहार बड़ी संख्या में योगदान करते हैं।
  • कानपुर – यहाँ की रामलीला में मुस्लिम समाज के लोग परिधान, आभूषण और मुकुट बनाने में अपनी कला का योगदान देते हैं।
  • पटना और आस-पास के इलाके – कई मुस्लिम कारीगर रामलीला के लिए बड़े-बड़े झांकी मंच तैयार करते हैं।
  • मध्य प्रदेश (उज्जैन और इंदौर) – रामलीला की झांकियों के लिए मुस्लिम पेंटर और कलाकार रंगोली, पेंटिंग और पोस्टर बनाने में सहयोग देते हैं।
  • पश्चिम बंगाल – यहाँ की कुछ रामलीलाओं में मुस्लिम ढोलकिया और बैंड कलाकार मंचन के दौरान संगीत में अहम भूमिका निभाते हैं।

एकता और भाईचारे का प्रतीक

रामलीला का आयोजन केवल धार्मिक श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि यह सामाजिक एकता और भाईचारे की मिसाल भी है। मुस्लिम समुदाय का योगदान इस बात को मजबूत करता है कि भारत की असली पहचान विविधता में एकता है। काशी से लेकर दिल्ली, लखनऊ, पटना और उज्जैन तक रामलीला यह संदेश देती है कि धर्म चाहे अलग हों, लेकिन संस्कृति और इंसानियत सबको एक सूत्र में बांध सकती है।

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