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ओवैसी की यूपी एंट्री से बढ़ी हलचल, मुस्लिम वोट बैंक पर सपा की बढ़ी चिंता, अब आगे क्या ?

ओवैसी की यूपी एंट्री से बढ़ी हलचल, मुस्लिम वोट बैंक पर सपा की बढ़ी चिंता, अब आगे क्या ?

पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी नई हलचल तेज हो गई है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM भले ही बंगाल में एक भी सीट नहीं जीत सकी, लेकिन अब उनकी नजर पूरी तरह यूपी चुनाव 2027 पर टिक गई है। इसी वजह से समाजवादी पार्टी के भीतर भी बेचैनी बढ़ने की चर्चा हो रही है। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि क्या बंगाल में हुमायूं कबीर वाला फॉर्मूला अब उत्तर प्रदेश में भी लागू हो सकता है। क्योंकि बंगाल चुनाव में मुस्लिम बहुल इलाकों में वोटों के बंटवारे की चर्चा सबसे ज्यादा हुई थी।

हुमायूं मॉडल पर नजर

बंगाल चुनाव में हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी पहले साथ आए थे, लेकिन बाद में दोनों अलग हो गए। हुमायूं कबीर ने अपनी अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा और दो सीटों पर जीत दर्ज की। दूसरी तरफ AIMIM खाता भी नहीं खोल सकी। हालांकि चुनाव के बाद सबसे ज्यादा चर्चा मुस्लिम वोटों के बंटवारे को लेकर हुई। खासकर मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे इलाकों में बीजेपी को फायदा मिलने की बातें सामने आईं। यही वजह है कि अब यूपी की राजनीति में भी इस मॉडल को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

यूपी में बड़ा समीकरण

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 19 प्रतिशत मानी जाती है और लगभग 85 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2022 विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 63 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 34 जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। यानी मुस्लिम वोट बैंक को सपा की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। लेकिन अब असदुद्दीन ओवैसी उसी वोट बैंक में अपनी जगह बनाने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं। AIMIM पहले ही संकेत दे चुकी है कि वह यूपी की कई सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।

सपा की बढ़ी चिंता

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर 2027 में मुस्लिम वोटों में थोड़ा भी बंटवारा हुआ तो उसका सबसे बड़ा असर समाजवादी पार्टी पर पड़ सकता है। 2017 चुनाव में भी विपक्षी वोटों के बंटवारे का फायदा बीजेपी को मिला था। मुस्लिम बहुल सीटों में बीजेपी ने बड़ी जीत दर्ज की थी जबकि सपा और कांग्रेस गठबंधन पीछे रह गया था। यही वजह है कि अब सपा खेमे में AIMIM की रणनीति को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है। कई नेताओं को डर है कि त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति बनने पर चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।

नई रणनीति पर नजर

इधर अखिलेश यादव भी अपने राजनीतिक नैरेटिव को बदलने में जुटे हुए दिखाई दे रहे हैं। PDA के साथ-साथ वह सॉफ्ट हिंदुत्व और नए सामाजिक समीकरणों पर भी काम कर रहे हैं। माना जा रहा है कि सपा अब सिर्फ मुस्लिम वोटों पर निर्भर रहने के बजाय व्यापक सामाजिक गठजोड़ बनाने की तैयारी कर रही है। लेकिन अगर AIMIM मुस्लिम बहुल सीटों पर मजबूती से उतरती है तो कई जगह मुकाबला बेहद दिलचस्प हो सकता है।

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