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Mumbai Train Blast Case: बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, 12 आरोपी को किया था बरी

Mumbai Train Blast Case: बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, 12 आरोपी को किया था बरी

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में 11 जुलाई 2006 को लोकल ट्रेनों में हुए बम धमाकों ने पूरे देश को हिला दिया था। इन हमलों में 189 लोगों की मौत हुई थी और 824 से अधिक लोग घायल हुए थे। यह भारत के सबसे भयावह आतंकी हमलों में से एक था। इस मामले मे बॉम्बे हाईकोर्ट ने 19 साल बाद 12 आरोपी को रिहा कर दिया था। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है।

आपको बता दे मुंबई ट्रेन ब्लास्ट मामले में (एटीएस) ने जांच की और 13 लोगों को आरोपी बनाया, जिनमें से 12 को 2015 में विशेष मकोका अदालत ने दोषी ठहराया था। इनमें से पांच को फांसी और सात को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। एक आरोपी को उस समय बरी कर दिया गया था। 21 जुलाई 2025 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सभी 12 दोषियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूत “ठोस और विश्वसनीय नहीं थे। कोर्ट ने बताया कि आरोपियों ने यह साबित किया कि उनके कबूलनामे जबरदस्ती लिए गए थे।

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को "संदेह से परे" साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। कोर्ट ने गवाहों के बयानों को विरोधाभासी और अविश्वसनीय पाया, टैक्सी चालकों की पहचान प्रक्रिया में खामियां बताईं, और यह भी कहा कि बम की प्रकृति या आरोपियों की प्रत्यक्ष भूमिका को सिद्ध नहीं किया जा सका। इसके अलावा, राज्य सरकार द्वारा फांसी की सजा की पुष्टि के लिए दायर याचिका को भी खारिज कर दिया गया।

इस फैसले ने न केवल जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए, बल्कि पीड़ितों और उनके परिवारों में निराशा पैदा की। एक पीड़ित के बेटे, अनिरुद्ध मिश्रा ने कहा, "यह फैसला सुनकर गहरी निराशा हुई। 19 साल बाद भी हमें न्याय नहीं मिला। बता दें इस फैसले ने कई सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आ कीं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के कानूनी सलाहकार सैयद काब रशीदी ने फैसले का स्वागत करते हुए तत्कालीन केंद्र और राज्य सरकारों से मुसलमानों से माफी मांगने की मांग की। उनका कहना था कि इस मामले में मुस्लिम युवाओं को धर्म के आधार पर निशाना बनाया गया। वहीं, बीजेपी नेता किरीट सोमैया ने फैसले को "दुखद और हैरान करने वाला" बताया और नई जांच टीम गठित करने की मांग की। शिवसेना नेता संजय निरुपम ने भी सरकार से सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का समर्थन किया।

महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को "चौंकाने वाला" और "न्याय के हित में अनुचित" बताते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, "हम इस फैसले का अध्ययन कर रहे हैं और इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।" सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें हाईकोर्ट के फैसले को कानूनी रूप से अस्थिर बताया गया और तत्काल सुनवाई की मांग की गई।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहां

24 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के 12 आरोपियों को बरी करने वाले फैसले पर रोक लगा दी। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने इस मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार किया और सभी पक्षों को एक महीने के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट की इस रोक के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या बरी हुए 12 आरोपी फिर से जेल लौटेंगे। दो आरोपियों को हाईकोर्ट के फैसले के बाद 21 जुलाई 2025 को ही नागपुर सेंट्रल जेल से रिहा कर दिया गया था।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि अभियोजन पक्ष बम धमाकों में प्रयुक्त विस्फोटकों के प्रकार तक का विवरण प्रस्तुत नहीं कर सका। गवाहों की पहचान प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं, और बम, बंदूक या नक्शों की जब्ती को भी निर्णायक नहीं माना गया। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि कुछ बयान यातना के दबाव में लिए गए थे, जैसा कि बचाव पक्ष के वकीलों ने दलील दी थी।

महाराष्ट्र एटीएस ने दावा किया था कि आरोपी प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) और लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) के साथ मिलकर साजिश रचने में शामिल थे। हालांकि, एक इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) के आरोपी ने 2008 में दावा किया था कि धमाके उनकी टीम ने किए थे, जिसने जांच को और जटिल बना दिया।

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