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मुंबई 7/11 ट्रेन ब्लास्ट केस, सभी 12 आरोपी बरी, कोर्ट ने कही यें बात

मुंबई 7/11 ट्रेन ब्लास्ट केस, सभी 12 आरोपी बरी, कोर्ट ने कही यें बात

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में 11 जुलाई 2006 को लोकल ट्रेनों में हुए बम धमाकों ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इन धमाकों में 189 लोगों की जान गई थी और 827 से अधिक लोग घायल हुए थे। 19 साल बाद, 21 जुलाई 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले में बड़ा और ऐतिहासिक फैसला है जिसके मुताबिक निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया है।

बता दें 11 जुलाई 2006 को शाम 6:24 बजे से 6:35 बजे के बीच, मुंबई के पश्चिमी रेलवे नेटवर्क की सात लोकल ट्रेनों के फर्स्ट-क्लास डिब्बों में 11 मिनट के अंतराल में सात बम धमाके हुए। ये धमाके माटुंगा, बांद्रा, खार, माहिम, जोगेश्वरी, बोरिवली और भायंदर स्टेशनों के पास हुए। इनमें प्रेशर कुकर बमों में आरडीएक्स का इस्तेमाल किया गया था। माहिम स्टेशन पर सबसे अधिक 43 लोगों की मौत हुई थी। इस हमले को 1993 के मुंबई बम धमाकों के बाद शहर का सबसे बड़ा आतंकी हमला माना गया।

महाराष्ट्र पुलिस और आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने जांच शुरू की और 13 संदिग्धों को गिरफ्तार किया। जांच में लश्कर-ए-तैयबा और सिमी जैसे संगठनों की कथित संलिप्तता का दावा किया गया। कुछ संदिग्धों के पाकिस्तान भागने की आशंका भी जताई गई। 2015 में विशेष मकोका अदालत ने 12 आरोपियों को दोषी ठहराया, जिनमें पांच को मृत्युदंड और सात को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। एक आरोपी, अब्दुल वाहिद शेख, को उसी समय बरी कर दिया गया था।

कोर्ट ने क्या कहां?

21 जुलाई 2025 को, जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस श्याम चांडक की खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूत "ठोस और विश्वसनीय नहीं थे। कोर्ट ने बताया कि आरोपियों ने यह साबित किया कि उनके कबूलनामे जबरदस्ती लिए गए थे। एक आरोपी की अपील प्रक्रिया के दौरान मृत्यु हो गई थी, इसलिए 11 जीवित आरोपियों को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया गया, बशर्ते वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों।

कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष के पास आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे। आरोपियों ने दावा किया कि उनके कबूलनामे जबरदस्ती और दबाव में लिए गए थे, जिसे कोर्ट ने स्वीकार किया। फैसले ने पीड़ितों के परिवारों में मिश्रित प्रतिक्रियाएं पैदा कीं। कई ने सवाल उठाया कि यदि ये आरोपी दोषी नहीं हैं, तो असली अपराधी कौन हैं? इस फैसले ने मुंबई पुलिस और एटीएस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

महाराष्ट्र सरकार ने संकेत दिया है कि वह इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकती है। साथ ही, इस फैसले ने जांच एजेंसियों की सबूत जुटाने की प्रक्रिया पर फिर से विचार करने की मांग को तेज कर दिया है। पीड़ितों के परिवारों ने मांग की है कि असली दोषियों को जल्द से जल्द पकड़ा जाए ताकि उन्हें न्याय मिल सके।

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