अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद ईरान के साथ चल रही जंग का असर अब पूरी दुनिया पर दिखने लगा है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। खासकर होर्मुज जलमार्ग पर दबाव बढ़ने से शिपिंग करीब 70 प्रतिशत तक घट गई है, जिससे ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति दोनों पर संकट गहराता नजर आ रहा है।
खाद्यान्न संकट की चेतावनी
आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक और वर्ल्ड फूड प्रोग्राम ने संयुक्त बयान जारी कर चेतावनी दी है कि इस जंग का असर आगे चलकर फूड सिक्योरिटी पर पड़ेगा। वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के अनुसार अगर हालात नहीं सुधरे तो करीब 4.5 करोड़ लोग भुखमरी की चपेट में आ सकते हैं। लंबे समय तक युद्ध जारी रहने पर यह संकट और गहरा सकता है।
फर्टिलाइजर संकट बना बड़ी समस्या
फर्टिलाइजर उत्पादन के लिए जरूरी प्राकृतिक गैस और सल्फर की सप्लाई होर्मुज के जरिए होती है। इस रास्ते में बाधा आने से यूरिया और अन्य उर्वरकों की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। बाजार में उर्वरकों के दाम बढ़ रहे हैं और किसान महंगे दाम पर खरीदने से बच रहे हैं। इसका सीधा असर खेती और आने वाली फसल पर पड़ सकता है।
तेल की कीमतों से बढ़ी मुश्किलें
कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 95 से 100 डॉलर प्रति बैरल के बीच पहुंच गई हैं। महंगे तेल के कारण ट्रांसपोर्ट और उत्पादन लागत बढ़ रही है। इसका असर खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी पड़ रहा है। साथ ही कुछ देशों में अनाज का इस्तेमाल बायोफ्यूल बनाने में बढ़ने से खाने के लिए उपलब्ध मात्रा कम हो रही है।
भारत पर क्या होगा असर
भारत जैसे देश, जो उर्वरकों के लिए आयात पर निर्भर हैं, इस संकट से ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। मिडिल ईस्ट से यूरिया की सप्लाई प्रभावित होने पर किसानों की लागत बढ़ेगी। इसका असर सीधे आम लोगों की थाली पर पड़ेगा और दाल, चावल, सब्जी जैसी चीजें महंगी हो सकती हैं। साथ ही महंगे तेल से रुपये पर दबाव और महंगाई बढ़ने की संभावना है।
आगे की स्थिति पर टिकी नजर
फिलहाल भारत के पास अनाज का पर्याप्त भंडार है, जिससे तुरंत राहत मिल सकती है। लेकिन अगर जंग लंबी चली तो हालात 2022 के रूस-यूक्रेन संकट से भी ज्यादा गंभीर हो सकते हैं। ऐसे में पूरी दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि मिडिल ईस्ट में तनाव कब तक कम होता है और सप्लाई चेन सामान्य कब होती है।
