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मैस्कर घाट विद्रोह और नरसंहार की जमीं, 300 अंग्रेजों की इसी घाट पर हुई थी मौत

मैस्कर घाट विद्रोह और नरसंहार की जमीं, 300 अंग्रेजों की इसी घाट पर हुई थी मौत

वैसे तो कानपुर में गंगा नदी के किनारे कई घाट है, इनमें अटल घाट, परमट घाट, रानी घाट, भगवतदास घाट और तमाम घाट हैं हमारे कानपुर में लेकिन, कानपुर के कैंट एरिया में बना मैस्कर घाट देश और दुनिया में सबसे अधिक चर्चित है इसके पीछे इसकी ठोस वजह है, इस घाट पर 1857 की क्रांति के आस-पास ही अंग्रेजों का ऐसा नरसंहार हुआ जिसने सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

कानपुर के इतिहास में यह ऐसा हत्याकांड था जिसे लोग और इतिहासकार आज भी याद करते हैं, सैन्य अधिकारी मॉब्रे थॉमसन ने अपनी किताब- स्टोरी आफ कानपुर में इस दास्तां को बयां भी किया है, वहीं अंग्रेजों के समय से ही इस घाट पर बहने वाली मां गंगा में अंग्रेजों की लाशों को बहाया गया. इतिहासकार भी इस बात को कहने से गुरेज नहीं करते, गंगा तीरे बने मैस्कर घाट को आज की पीढ़ी को समझना होगा, यह वह घाट है,जहां से क्रांति की लौ जली थी। इसलिए कोई इसे नरसंहार घाट या सत्तीचौरा घाट भी कहता है।

1857 की गदर का यह घाट गवाह रहा है, आज के दौर में इसे पिकनिक स्पॉट के रुप में देखा जा रहा है, खासकर सनातनियों के लिए, क्योंकि यहां कल-कल बह रही गंगा की लहरों के नजारें मिलते हैं और हिन्दुओं के देवी-देवताओं के दर्शन आजकल बारिश के मौसम में यहां काशी के घाटों का दृश्य भी दिखाई देता है।

आपको बताते हैं की कैसे क्रांतिकारियों ने फिरंगियों के दांत खट्टे किए, आपको इस घाट की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में ले चलते हैं। यूं तो कानपुर क्रांतिकारियों का गढ़ रहा है पर 1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान हुई एक दुखद घटना से यह घाट जुड़ा है। 27 जून, 1857 की बात है , लगभग 300 अंग्रेजों, जिनमें पुरुष, महिलाएं और बच्चे शामिल थे को यहाँ मार दिया गया था। इस घटना के बाद, घाट को नरसंहार घाट के रूप में जाना जाने लगा, और बाद में इसका नाम बदलकर नानाराव घाट कर दिया गया।

नरसंहार घाट की कहानी 1857 के भारतीय विद्रोह से जुड़ी है…. जब उस समय के कानपुर में अंग्रेजों और भारतीय सिपाहियों के बीच संघर्ष हुआ था…. 1857 की क्रांति की चिंगारी कानपुर में भी जमकर भड़की थी….इस दौरान स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेज़ी फ़ौजों की चूलें हिला कर रख दी थी…. इस कांड के बाद अंग्रेज आग बबूला हो गए थे….उन्होंने इस घटना के बाद 133 बेगुनाह भारतीयों को घाट पर मौजूद बरगद के पेड़ पर फांसी पर लटका दिया था….युद्ध के दौरान जो अंग्रेज मरे थे, उन्हें कुएं में दफना दिया गया था…. हालांकि अब कुंआ बंद कर दिया गया है….एक बात और , नाना साहब ने इसी घाट से ही दिल्ली चलो की जगह कानपुर चलो का नारा दिया था ….

इतिहासकार अनिल मिश्र बताते हैं कि 1857 में कानपुर में स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी भड़कती है और स्वतंत्रता सेनानियों की फ़ौज नवाबगंज से दिल्ली जाने के लिए कल्याणपुर पहुंच जाती है….इस दौरान बिठूर के पेशवा नाना साहब व अज़ीमुल्ला स्वतंत्रता सेनानियों को दिल्ली की जगह कानपुर में क़ब्ज़ा करने के लिए समझाते हैं तभी नाना साहब ने दिल्ली चलो की जगह कानपुर चलो का नारा दिया था…फिलहाल इस खास प्रोग्राम में इतना ही …आज हम इस सौर्य गाथा के उन सच्चे क्रांतिकारियों को विनम्र श्रद्धांजलि देते हैं और उनसे वादा करते हैं कि जिस आजादी के लिए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी… तो आज और अभी से हम भी, जात-पात, उच नीच, रंग भेद की बेड़ियों को तोड़कर एक नया आजाद हिंदुस्तान बनाएंगे….एक बार फिर से आप सभी को 15 अगस्त की बहुत सारी

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