लद्दाख की शांत ऊंची वादियों में आज एक ऐसी त्रासदी घटी, जिसने पूरे क्षेत्र को सदमे में डाल दिया। राज्यत्व और संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा की मांग को लेकर चली आ रही शांतिपूर्ण आंदोलन ने अचानक हिंसक रूप धारण कर लिया। झड़पों में चार लोगों की मौत हो गई, जबकि 72 से अधिक लोग घायल हो गए। प्रशासन ने तत्काल कर्फ्यू लगा दिया है, और अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात कर दिए गए हैं। यह घटना न केवल लद्दाख की राजनीतिक अस्थिरता को उजागर करती है, बल्कि केंद्र सरकार के साथ संवाद की अनिवार्यता को भी रेखांकित करती है।
क्या घटी घटना
सुबह से ही लेह अपेक्स बॉडी (LAB) की युवा इकाई द्वारा बुलाए गए बंद के दौरान हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए। उनका मुख्य मुद्दा था लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देना और आदिवासी क्षेत्रों की रक्षा के लिए छठी अनुसूची लागू करना। यह आंदोलन पिछले कई महीनों से चल रहा था, लेकिन आज का दिन निर्णायक साबित हुआ।
प्रदर्शनकारियों ने स्थानीय बीजेपी कार्यालय पर हमला कर दिया और उसे आग के हवाले कर दिया। एक वाहन को भी आग लगा दी गई। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया। स्थिति बेकाबू होने पर पुलिस को फायरिंग का सहारा लेना पड़ा, जिसके नतीजे में चार युवाओं की जान चली गई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 72 लोग घायल हुए हैं, जिनमें से कई को अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
जिला मजिस्ट्रेट ने धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा जारी कर पांच या इससे अधिक लोगों के जमावड़े पर रोक लगा दी है। लेह शहर में सुरक्षा बलों की भारी तैनाती है, और किसी भी तरह की प्रक्रिया या सभा पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
सोनम वांगचुक का आह्वान
आंदोलन के प्रमुख चेहरे, पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने इस हिंसा पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने 10 सितंबर से शुरू की गई 15 दिवसीय भूख हड़ताल आज समाप्त कर दी। वांगचुक ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश जारी कर युवाओं से अपील की, "यह बकवास बंद करो। मेरी शांति की पुकार आज विफल हो गई। हिंसा से हमारा संघर्ष कमजोर होता है, न कि मजबूत। कोई भी आंदोलन तब सफल नहीं होता जब जानें चली जाती हैं।"
वांगचुक ने बताया कि भूख हड़ताल के दौरान 15 में से दो सदस्यों की हालत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल ले जाया गया था, जिसके बाद बंद का आह्वान किया गया। उन्होंने केंद्र सरकार से 6 अक्टूबर को निर्धारित वार्ता को जल्दी करने की मांग दोहराई। "हमारी पांच साल की मेहनत को एक दिन की हिंसा नष्ट न कर दे," उन्होंने कहा।
आरोप-प्रत्यारोप का दौर
इस घटना ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने कांग्रेस पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक काउंसलर की तस्वीर साझा कर कहा, "यह व्यक्ति कांग्रेस का है, जो भीड़ को उकसा रहा था।" पूर्व जम्मू-कश्मीर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्र पर जिम्मेदारी डाली और कहा कि आर्टिकल 370 हटाने के बाद लद्दाख और जम्मू-कश्मीर दोनों को राज्य का दर्जा देने में जानबूझकर देरी की जा रही है।
राष्ट्रीय सम्मेलन के विधायक तनवीर सादिक ने इसे "दुर्भाग्यपूर्ण" बताते हुए कहा, "केंद्र सरकार दिल्ली में बैठी है, लेकिन लद्दाख की आवाज सुनने को तैयार नहीं। हिंसा की निंदा करते हैं, लेकिन बातचीत ही समाधान है।"
लद्दाख में प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें
- पूर्ण राज्य का दर्जा: लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश के बजाय पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग, ताकि स्थानीय लोगों को विधायी अधिकार और स्वायत्तता मिले।
- छठी अनुसूची का लागू होना: संविधान की छठी अनुसूची के तहत आदिवासी क्षेत्रों को विशेष संरक्षण प्रदान करने की मांग, जिससे भूमि, संस्कृति और संसाधनों की रक्षा हो।
- स्थानीय रोजगार और संसाधनों की सुरक्षा: लद्दाख के मूल निवासियों के लिए नौकरियों और जमीन के अधिकारों की गारंटी।
- पर्यावरण संरक्षण: औद्योगिक और बाहरी हस्तक्षेप से लद्दाख के नाजुक पर्यावरण को बचाने के लिए नीतियां।
लद्दाख का संघर्ष: 2019 से चली आ रही मांगें
लद्दाख को 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद से ही यहां असंतोष पनप रहा है। स्थानीय लोग मानते हैं कि यूनियन टेरिटरी का दर्जा पर्याप्त नहीं है। वे राज्यत्व चाहते हैं ताकि भूमि, नौकरियां और पर्यावरण की रक्षा हो सके। छठी अनुसूची लागू होने से आदिवासी संस्कृति और संसाधनों को संरक्षण मिलेगा।
LAB और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) जैसे संगठन लंबे समय से इन मांगों पर अड़े हैं। आज की हिंसा ने न केवल वार्षिक लद्दाख फेस्टिवल के समापन समारोह को रद्द करा दिया, बल्कि पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधियों पर भी असर डाला। एक स्थानीय राजनीतिक विश्लेषक ने कहा, "शांतिपूर्ण विरोध ने वर्षों तक आवाज उठाई, लेकिन प्रगति न होने से युवाओं में हताशा बढ़ गई। अब केंद्र को तुरंत कदम उठाने होंगे।"
आगे की राह
यह घटना लद्दाख के भविष्य के लिए एक चेतावनी है। हिंसा से कोई हल नहीं निकलता, बल्कि यह संघर्ष को और जटिल बना देती है। केंद्र सरकार को 6 अक्टूबर की वार्ता से पहले ही कदम उठाने चाहिए। स्थानीय युवाओं को शांति का संदेश देने वाले वांगचुक जैसे नेताओं की अपील पर ध्यान देना होगा। लद्दाख की यह ऊंची भूमि, जहां बौद्ध संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम है, अब राजनीतिक उथल-पुथल से जूझ रही है। उम्मीद है कि यह त्रासदी अंतिम न साबित हो और संवाद से समाधान निकले। हम प्रभावित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हैं और शांति की कामना करते हैं।
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