वीडियो में दिखा 'किडनी कांड' का खौफनाक सच, करोड़ों की डील और मरीजों से ठगी का नेटवर्क बेनकाब, पढ़ें एक क्लिक में
कानपुर में अवैध किडनी ट्रांसप्लांट नेटवर्क की जांच के दौरान पुलिस के हाथ ऐसे सबूत लगे हैं, जिन्होंने पूरे मामले की गंभीरता को उजागर कर दिया है। दलाल शिवम अग्रवाल के मोबाइल से मिले तीन वीडियो इस काले कारोबार की असल तस्वीर दिखा रहे हैं। एक वीडियो में मेरठ का डॉक्टर नोटों की गड्डियों पर लेटा दिखाई दे रहा है, जिससे इस रैकेट की कमाई का अंदाजा लगाया जा सकता है।
फर्जी डॉक्टर बनकर करता था खेल
जांच में सामने आया है कि शिवम अग्रवाल, जो पेशे से एम्बुलेंस ड्राइवर है, खुद को डॉक्टर बताकर मरीजों का भरोसा जीतता था। वह स्टेथोस्कोप लगाकर जांच करता और इलाज का भरोसा देता था। एक वीडियो में वह दक्षिण अफ्रीका की महिला मरीज की जांच करता दिख रहा है। इस ट्रांसप्लांट के लिए करोड़ों की डील होने की बात भी सामने आई है, जिससे नेटवर्क की पहुंच का पता चलता है।
पीड़ितों की दर्दभरी कहानी
इस मामले में कई पीड़ित सामने आए हैं, जिनकी कहानी बेहद दर्दनाक है। एक वीडियो में पंजाब का एक व्यक्ति रोते हुए बताता है कि उससे ट्रांसप्लांट के नाम पर 43 लाख रुपये ठग लिए गए, लेकिन इलाज नहीं हुआ। आर्थिक तंगी से जूझ रहे इस व्यक्ति ने आत्महत्या तक की बात कही है। कई मरीज ऐसे हैं जिन्होंने अपनी पूरी जमा-पूंजी गंवा दी, लेकिन आज भी सही इलाज नहीं मिल पाया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैला नेटवर्क
पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि यह रैकेट सिर्फ भारत तक सीमित नहीं था। यह नेटवर्क नेपाल से किडनी खरीदकर विदेशी मरीजों को भारत लाने और अवैध ट्रांसप्लांट कराने का काम करता था। इसके तार दुबई तक जुड़े होने की बात सामने आई है, जिससे यह साफ होता है कि यह एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय गिरोह है।
फरार डॉक्टरों की तलाश जारी
इस मामले के मुख्य आरोपी डॉक्टर अभी फरार हैं और उनकी तलाश में पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है। दिल्ली, नोएडा और मेरठ समेत कई जगहों पर कार्रवाई जारी है। पुलिस का मानना है कि मोबाइल से मिले वीडियो और चैट्स इस केस में अहम सबूत साबित होंगे और आरोपियों को सजा दिलाने में मदद करेंगे।
सिस्टम पर उठे बड़े सवाल
इस पूरे मामले ने स्वास्थ्य व्यवस्था और निगरानी तंत्र पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। कैसे एक एम्बुलेंस ड्राइवर ऑपरेशन थिएटर तक पहुंच गया और इतने बड़े स्तर पर अवैध ट्रांसप्लांट होता रहा, यह चिंता का विषय है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि पुलिस इस नेटवर्क को पूरी तरह खत्म करने में कितनी सफलता हासिल करती है।
