भारत सरकार ने आज एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 'भारत टैक्सी' नामक देश की पहली सहकारी कैब सेवा की शुरुआत की घोषणा की है। ओला और उबर जैसी निजी कंपनियों के दबदबे को चुनौती देते हुए यह सेवा ड्राइवरों के हितों को प्राथमिकता देती है, जहां हर राइड की 100% कमाई सीधे ड्राइवर के खाते में जाएगी। कोई कमीशन नहीं, सिर्फ एक मामूली सदस्यता शुल्क। दिल्ली में 650 ड्राइवरों के साथ पायलट प्रोजेक्ट शुरू हो चुका है, जबकि दिसंबर तक पूरे देश में 5,000 ड्राइवरों के साथ इसका विस्तार होगा। यह न केवल कैब इंडस्ट्री में क्रांति लाएगा, बल्कि लाखों ड्राइवरों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का वादा भी करता है।
सहकारिता मंत्रालय के तहत लॉन्च की गई यह सेवा 'सहकार टैक्सी' मॉडल पर आधारित है, जो स्थानीय स्वामित्व और विश्वास पर टिकी हुई है। केंद्रीय सहकारिता मंत्री ने लॉन्च इवेंट के दौरान कहा, "भारत टैक्सी ड्राइवरों को सशक्त बनाने का माध्यम बनेगी। निजी ऐप्स की लूट मचाने वाली फीस स्ट्रक्चर के खिलाफ यह एक मजबूत विकल्प है।" दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश में शुरुआती रोलआउट के साथ, यह ऐप-बेस्ड सेवा महिलाओं के लिए 'सरथी' कैटेगरी भी पेश करेगी, जहां विशेष रूप से महिलाएं ड्राइवर बन सकेंगी।
ड्राइवरों के लिए नया दौर
कैब इंडस्ट्री में ड्राइवरों की सबसे बड़ी शिकायत रही है कि ओला-उबर जैसी कंपनियां हर राइड पर 20-25% तक कमीशन काट लेती हैं। ऊपर से ईंधन, रखरखाव और बीमा के खर्चे। लेकिन भारत टैक्सी में ऐसा कुछ नहीं होगा। ड्राइवरों को सिर्फ एक छोटी सदस्यता फीस (लगभग 500-1,000 रुपये मासिक) देनी होगी, जो सेवा के रखरखाव के लिए इस्तेमाल होगी। बाकी सारी कमाई—चाहे वह राइड फेयर हो या टिप्स—सीधे उनके पास। यह मॉडल सहकारी सिद्धांतों पर आधारित है, जहां ड्राइवर खुद ही सेवा के मालिक हैं।
दिल्ली के एक ड्राइवर, जिन्होंने पायलट प्रोजेक्ट में हिस्सा लिया है, ने बताया, "पिछले पांच साल से उबर के साथ काम कर रहा हूं। हर महीने 20-30 हजार का कमीशन कट जाता था। अब भारत टैक्सी से मेरी कमाई दोगुनी हो जाएगी।" सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में करीब 15 लाख कैब ड्राइवर हैं, जिनमें से 70% निजी ऐप्स पर निर्भर हैं। यह सेवा उनमें से कम से कम 10% को तुरंत आकर्षित कर लेगी, विशेषज्ञों का अनुमान है।
ऐप की खासियतें भी कम नहीं हैं। जीपीएस ट्रैकिंग, रीयल-टाइम फेयर कैलकुलेशन, सुरक्षित पेमेंट गेटवे और इमरजेंसी बटन जैसी सुविधाएं इसे आधुनिक बनाती हैं। महिलाओं के लिए 'सरथी' मोड में केवल महिला ड्राइवरों को प्राथमिकता मिलेगी, जो रात के समय यात्रा करने वाली महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन देकर पर्यावरण संरक्षण का भी ध्यान रखा गया है। शुरुआती चरण में 20% वाहन ईवी होंगे।
निजी कंपनियों के एकाधिकार के खिलाफ सरकारी हस्तक्षेप
भारत में राइड-हेलिंग मार्केट 2025 तक 1.5 लाख करोड़ रुपये का हो चुका है, लेकिन ड्राइवरों की हालत दयनीय रही है। 2023 में ड्राइवरों के बड़े आंदोलन के बाद सरकार ने सहकारी मॉडल पर विचार किया था। केंद्रीय बजट 2024-25 में 'सहकार से समृद्ध भारत' अभियान के तहत 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया, जिसके तहत भारत टैक्सी को हरी झंडी मिली।
यह सेवा न केवल आर्थिक न्याय प्रदान करेगी, बल्कि रोजगार सृजन में भी योगदान देगी। पायलट प्रोजेक्ट में 650 ड्राइवरों को ट्रेनिंग दी गई है, जिसमें डिजिटल लिटरेसी और ग्राहक सेवा पर जोर दिया गया। महाराष्ट्र में मुंबई के टैक्सी यूनियनों ने इसका स्वागत किया है, जबकि गुजरात के अहमदाबाद में पहले ही 200 ड्राइवर रजिस्टर हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश में लखनऊ और कानपुर जैसे शहरों में विस्तार की योजना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल वैश्विक स्तर पर अनुकरणीय हो सकता है। आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. राजेश कुमार ने कहा, "सहकारी अर्थव्यवस्था ड्राइवरों को उद्यमी बना देगी। ओला-उबर को अब अपनी फीस स्ट्रक्चर पर पुनर्विचार करना पड़ेगा।" हालांकि, चुनौतियां भी हैं। निजी कंपनियां बाजार हिस्सेदारी बचाने के लिए डिस्काउंट वॉर शुरू कर सकती हैं, और ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी एक बाधा बनेगी। लेकिन सरकार का लक्ष्य 2026 तक 50,000 ड्राइवरों को जोड़ना है।
यात्री और अर्थव्यवस्था पर असर
यात्रियों के लिए भारत टैक्सी सस्ती और विश्वसनीय साबित होगी। कमीशन न होने से फेयर रेट्स स्थिर रहेंगे, और सरकारी निगरानी से पारदर्शिता बढ़ेगी। महामारी के बाद बढ़ी ईंधन कीमतों के बावजूद, ड्राइवरों की बेहतर कमाई से सेवा की गुणवत्ता सुधरेगी। पर्यावरण के लिहाज से ईवी फ्लीट का विस्तार कार्बन उत्सर्जन कम करेगा।
अर्थव्यवस्था पर इसका असर व्यापक होगा। ड्राइवरों की बढ़ी आय से उपभोग बढ़ेगा, जो जीडीपी को बूस्ट देगा। सहकारिता मॉडल छोटे शहरों में फैलेगा, जहां निजी ऐप्स का पहुंच कम है। महिलाओं की भागीदारी से जेंडर इक्वालिटी को बढ़ावा मिलेगा। एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि 20% ड्राइवर महिलाएं होंगी, तो 1 लाख नई नौकरियां सृजित होंगी।



