अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के कारण भारत के अमेरिका को निर्यात में तेज गिरावट दर्ज की गई है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) की रिपोर्ट के अनुसार, मई से सितंबर 2025 तक चार महीनों में भारतीय निर्यात 37.5 प्रतिशत घटकर 5.5 अरब डॉलर रह गया, जो कुल मूल्य में 3.3 अरब डॉलर की कमी दर्शाता है। यह वर्ष 2025 की सबसे तीव्र और लगातार गिरावट है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन गई है।
जीटीआरआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि वाशिंगटन द्वारा ज्यादातर भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ ने सीधे प्रभाव डाला है। सितंबर 2025 पहला पूर्ण महीना था जब ये टैरिफ पूरी तरह लागू हुए, और उसी महीने निर्यात 20.3 प्रतिशत गिरकर 5.5 अरब डॉलर पर सिमट गया। अगस्त में 6.87 अरब डॉलर से यह गिरावट चौथी लगातार मासिक कमी का रूप ले चुकी है।
गिरावट का महीना
निर्यात में गिरावट की शुरुआत जून 2025 से हुई, जब मई का आंकड़ा 8.8 अरब डॉलर (4.8 प्रतिशत की वृद्धि के साथ) अंतिम सकारात्मक महीना था।
- जून: 5.7 प्रतिशत की कमी के साथ 8.3 अरब डॉलर।
- जुलाई: 3.6 प्रतिशत गिरावट के साथ 8.0 अरब डॉलर।
- अगस्त: 13.8 प्रतिशत की तेज कमी के साथ 6.9 अरब डॉलर।
- सितंबर: 20.3 प्रतिशत की सबसे बड़ी मासिक गिरावट के साथ 5.5 अरब डॉलर।
यह कुल 37.5 प्रतिशत की कमी मई से सितंबर तक का आंकड़ा है, जो अमेरिका को भारत के सबसे बड़े निर्यात बाजार (2024 में द्विपक्षीय व्यापार 190 अरब डॉलर) के रूप में प्रभावित कर रहा है।
सबसे प्रभावित क्षेत्र
टैरिफ का सबसे ज्यादा असर श्रम-गहन क्षेत्रों पर पड़ा है, जहां भारतीय उत्पाद अब बांग्लादेश और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले महंगे हो गए हैं। प्रमुख प्रभावित क्षेत्र:
- परिधान और चमड़ा: ये क्षेत्र अब गैर-प्रतिस्पर्धी हो चुके हैं, जिससे सितंबर में परिधान निर्यात में 10.14 प्रतिशत और कपड़ा निर्यात में 10.45 प्रतिशत की कमी आई। अप्रैल-सितंबर के छह महीनों में कपड़ा निर्यात में केवल 1.85 प्रतिशत की गिरावट थी, लेकिन अब यह तेज हो रही है।
- रत्न और आभूषण: 9.1 प्रतिशत की कमी, जिसमें डायमंड-स्टडेड गोल्ड ज्वेलरी में 25.5 प्रतिशत और कट एंड पॉलिश्ड डायमंड्स में 15.2 प्रतिशत की गिरावट।
- इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्टफोन: मई में 2.29 अरब डॉलर से अगस्त में घटकर 964.8 मिलियन डॉलर, यानी 58 प्रतिशत की चोट। भारत का अमेरिका को स्मार्टफोन निर्यात 2024 में 10.6 अरब डॉलर था, जो अब खतरे में है।
- रसायन, मशीनरी और कृषि उत्पाद: कृषि में प्रोसेस्ड फूड में 13.9 प्रतिशत, डेयरी में 31.1 प्रतिशत और खाद्य तेल में 69.7 प्रतिशत की कमी। फार्मास्यूटिकल्स में भी 13.3 प्रतिशत की गिरावट।
ये क्षेत्र कुल निर्यात का बड़ा हिस्सा बनाते हैं, और इस गिरावट से भारत के विनिर्माण और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता पर मध्यम अवधि में असर पड़ सकता है।
रूस और व्यापार बाधाओं पर अमेरिकी नाराजगी
ट्रंप प्रशासन ने 27 अगस्त 2025 को ये 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए, जो भारत की रूस से ऊर्जा खरीद और व्यापार बाधाओं के जवाब में थे। अमेरिका भारतीय उत्पादों पर बाजार पहुंच बढ़ाने और कृषि-विनिर्माण निर्यात के लिए दबाव बना रहा है। इससे पहले अप्रैल 2025 में ही अनुमान लगाया गया था कि पूरे वर्ष निर्यात में 5.76 अरब डॉलर की कमी हो सकती है, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, समुद्री भोजन और सोने में।
हालांकि, टैरिफ से मुक्त उत्पाद (जैसे कुछ फार्मा और कृषि आइटम, जो कुल निर्यात का 28.5 प्रतिशत हैं) में भी 41.9 प्रतिशत की अप्रत्याशित गिरावट देखी गई, जो उत्पादन में घटतौली या प्रतिस्पर्धा के कारण हो सकती है।
व्यापार घाटा बढ़ा, लेकिन आयात में वृद्धि
सितंबर में भारत का अमेरिका को व्यापार अधिशेष घट गया। निर्यात 11.93 प्रतिशत गिरकर 5.46 अरब डॉलर रह गया, जबकि आयात 11.78 प्रतिशत बढ़कर 3.98 अरब डॉलर हो गया। इससे द्विपक्षीय व्यापार घाटा बढ़ा, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अतिरिक्त चुनौती है।
भारत की प्रतिक्रिया
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ताएं फिर से शुरू हो चुकी हैं। एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल वर्तमान में वाशिंगटन में है, जो अगले महीने एक व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने का प्रयास कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ट्रंप के बीच लक्ष्य 500 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का है, लेकिन टैरिफ ने इसे प्रभावित किया है।
जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा, "यह गिरावट टैरिफ शासन का प्रत्यक्ष परिणाम है। नीति समीक्षा की आवश्यकता है ताकि भारत के व्यापार हित सुरक्षित रहें।" विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि भारत को वैकल्पिक बाजारों (जैसे यूरोपीय संघ) पर फोकस करना चाहिए और उत्पादन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना को मजबूत करना चाहिए।
कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री (सीआईटीआई) ने चेतावनी दी है कि यदि टैरिफ बने रहे, तो कपड़ा क्षेत्र में और नुकसान होगा। कुल मिलाकर, यह घटना भारत के निर्यात-प्रधान विकास मॉडल के लिए एक बड़ा झटका है, लेकिन सक्रिय कूटनीति से इसे कम किया जा सकता है।



