फीफा दुनिया में फुटबॉल चलाने वाली सबसे बड़ी संस्था है। यह खुद को नॉन-प्रॉफिट बताती है, यानी इसका मकसद शेयरहोल्डरों को मुनाफा बांटना नहीं है। फिर भी 2023 से 2026 के चार साल के चक्र में करीब 13 अरब डॉलर यानी लगभग 1 लाख 22 हजार करोड़ रुपये की कमाई का अनुमान है। इसकी सबसे बड़ी वजह 2026 फीफा वर्ल्ड कप है। अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको में हो रहे इस टूर्नामेंट में पहली बार 48 टीमें खेल रही हैं। ज्यादा टीमें मतलब ज्यादा मैच, ज्यादा टिकट और ज्यादा विज्ञापन का पैसा।
टीवी राइट्स सबसे बड़ा स्रोत
फीफा की सबसे बड़ी कमाई मैचों के टीवी और डिजिटल राइट्स से होती है। दुनिया भर के चैनल और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म वर्ल्ड कप दिखाने के लिए भारी रकम देते हैं। अनुमान है कि इस बार ब्रॉडकास्टिंग से करीब 5.3 अरब डॉलर आने की उम्मीद है। फुटबॉल वर्ल्ड कप को अरबों लोग देखते हैं, इसलिए विज्ञापन कंपनियां भी इससे जुड़ना चाहती हैं। भारत जैसे बड़े बाजारों में फुटबॉल देखने वालों की संख्या बढ़ने से टीवी और डिजिटल राइट्स की कीमत आगे और बढ़ सकती है।
टिकट और वीआईपी पैकेज
फीफा की कमाई का दूसरा बड़ा रास्ता टिकट और हॉस्पिटैलिटी पैकेज हैं। इस बार टिकटों की कीमत मांग के हिसाब से बदल रही है। जिस मैच की मांग ज्यादा होती है, उसका टिकट महंगा हो जाता है। आम सीटों के साथ कंपनियों और अमीर दर्शकों के लिए वीआईपी बॉक्स, होटल, खाना और मैच अनुभव वाले महंगे पैकेज भी बेचे जाते हैं। रिपोर्टों के मुताबिक टिकट और हॉस्पिटैलिटी से करीब 3.6 अरब डॉलर आने का अनुमान है। इसी वजह से आम फैंस के लिए वर्ल्ड कप देखना महंगा होता जा रहा है।
ब्रांड्स से भी बरसता पैसा
कोका-कोला, एडिडास, वीजा और कई बड़े ब्रांड फीफा के साथ जुड़ने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च करते हैं। फीफा उन्हें मैचों में विज्ञापन, स्टेडियम बोर्ड, डिजिटल प्रचार और वर्ल्ड कप से जुड़े प्रचार का अधिकार देता है। स्पॉन्सरशिप और मार्केटिंग से करीब 3.3 अरब डॉलर आने की बात कही गई है। इसके अलावा जर्सी, फुटबॉल, वीडियो गेम, खिलौने और दूसरे लाइसेंस वाले सामान से भी कमाई होती है। फीफा का नाम और वर्ल्ड कप का लोगो खुद एक बहुत बड़ा कारोबार बन चुका है।
पैसा जाता कहां है?
फीफा कहता है कि उसकी कमाई फुटबॉल में वापस लगाई जाती है। टूर्नामेंट कराने, टीमों को इनामी रकम देने, रेफरी और आयोजन पर बड़ा खर्च होता है। 2026 वर्ल्ड कप में इनामी राशि करीब 87 करोड़ डॉलर बताई जा रही है। फीफा अपने 211 सदस्य फुटबॉल संघों को विकास के लिए फंड भी देता है। इससे छोटे देशों में मैदान, कोचिंग, महिला फुटबॉल और युवा खिलाड़ियों के लिए काम होता है। लेकिन आलोचक कहते हैं कि फंड बांटने की प्रक्रिया पर ज्यादा पारदर्शिता होनी चाहिए।
नॉन-प्रॉफिट फिर भी ताकतवर
नॉन-प्रॉफिट होने का मतलब यह नहीं कि संस्था के पास पैसा नहीं होगा। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि बचा हुआ पैसा मालिकों में बांटने के बजाय संस्था और खेल पर खर्च होना चाहिए। फीफा के पास बड़ा रिजर्व फंड भी है, ताकि किसी संकट में टूर्नामेंट और फुटबॉल कार्यक्रम चलते रहें। आलोचना यह भी होती है कि टिकटों की बढ़ती कीमतों से आम फैंस दूर हो रहे हैं। फीफा के सामने असली चुनौती यही है कि कमाई बढ़ाने के साथ फुटबॉल को आम लोगों की पहुंच में भी बनाए रखे।
