बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की सरगर्मियों के बीच राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता और महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के दावेदार तेजस्वी प्रसाद यादव ने शुक्रवार को सहरसा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जोरदार हमला बोला। “फैक्ट्री गुजरात में लगाकर बिहार में विक्ट्री का फॉर्मूला अब नहीं चलेगा,” यह बयान न केवल केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि बिहार की राजनीति में ‘बाहरी’ बनाम ‘बिहारी’ की बहस को नई ऊंचाई देता है। तेजस्वी ने अपने पिता लालू प्रसाद यादव की निडरता का हवाला देते हुए कहा कि अगर लालू जी मोदी से नहीं डरे, तो उनका बेटा कैसे डरेगा? यह बयान बिहार की जनता के बीच विकास, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दों को केंद्र में लाने का प्रयास है, जो चुनावी मैदान में महागठबंधन की रणनीति का हिस्सा नजर आता है।
सहरसा की इस रैली में तेजस्वी ने हजारों समर्थकों के बीच उत्साह का माहौल बनाया। जनता के जयकारों के बीच उन्होंने कहा, “पीएम मोदी गुजरात में फैक्टरियां लगाते हैं और बिहार से सिर्फ वोट मांगते हैं। बिहार को मजदूरी के लिए मजबूर करने का यह खेल अब बंद हो जाएगा। बिहारी अब इन झांसों में नहीं आएंगे।” उनका यह कटाक्ष सीधे गृह मंत्री अमित शाह पर भी था, जिन्होंने हाल ही में बिहार में निवेश की कमी का बहाना जमीन की उपलब्धता बताते हुए गुजरात का जिक्र किया था। तेजस्वी ने तंज कसते हुए कहा, “20 साल तक केंद्र और बिहार में साथ मिलकर शासन करने के बावजूद गरीबी और बेरोजगारी क्यों बनी हुई है? अगर हमारी सरकार आ गई, तो हम 20 महीनों में वही करेंगे जो ये 20 सालों में नहीं कर पाए।”
यह बयान मूल रूप से लालू प्रसाद यादव का ही था, जिन्होंने सितंबर 2025 में सोशल मीडिया पर लिखा था, “बिहार में जीत चाहिए और फैक्ट्री गुजरात में।” तेजस्वी ने इसे आगे बढ़ाते हुए ‘बाहरी’ और ‘बिहारी’ के द्वंद्व को उभारा। “हम बिहारी हैं, बाहरी से डरने वाले नहीं। जब लालू जी नहीं डरे तो बेटवा डरेगा क्या?” यह पंक्ति न केवल परिवार की राजनीतिक विरासत को मजबूत करती है, बल्कि बिहार की युवा पीढ़ी को ललकारती है। रैली में मौजूद युवाओं ने तालियों की गड़गड़ाहट से इसका स्वागत किया, जो बताता है कि पलायन और बेरोजगारी जैसे मुद्दे अभी भी बिहार की राजनीति का केंद्र बिंदु हैं।
बिहार चुनाव 2025 का परिदृश्य पहले से ही रोचक है। 14 नवंबर को होने वाले पहले चरण के मतदान से पहले महागठबंधन ने तेजस्वी को सीएम फेस घोषित कर अपनी एकजुटता का संदेश दिया है। पटना के एक होटल में आयोजित बैठक में पूर्व राजस्थान सीएम अशोक गहलोत, वीआईपी प्रमुख मुकेश साहनी और सीपीआई(एमएल) के दीपंकर भट्टाचार्य जैसे नेताओं की मौजूदगी में यह फैसला लिया गया। कांग्रेस की ओर से शुरूआती हिचकिचाहट के बावजूद लालू प्रसाद, गहलोत और तेजस्वी के बीच बंद कमरों में हुई चर्चाओं ने सहमति बनाई। हालांकि, कुछ सीटों पर ‘फ्रेंडली कंटेस्ट’ की चर्चा अभी भी जारी है, लेकिन तेजस्वी की उम्मीदवारी ने गठबंधन को मजबूती दी है।
तेजस्वी ने रैली में अपने ‘परिवर्तन’ के विजन को दोहराया। उन्होंने वादा किया कि उनकी सरकार हर परिवार में एक सरकारी नौकरी सुनिश्चित करेगी, महिलाओं को 2500 रुपये मासिक सहायता देगी, 200 यूनिट बिजली मुफ्त होगी और ‘मां, अन्न, आमदनी’ जैसी योजनाओं से बिहार को ‘चिंता मुक्त’ राज्य बनाया जाएगा। “हम बिहार में ही उद्योग लगाएंगे, हर जिले में कारखाने खुलेंगे। बिहार के बच्चे विदेशों में पढ़ने या कमाने नहीं जाएंगे,” उन्होंने कहा। यह वादे न केवल एनडीए सरकार पर हमला हैं, बल्कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर भी। तेजस्वी ने नीतीश को ‘चाचा जी’ कहते हुए तंज कसा कि भाजपा ने उन्हें ‘हाईजैक’ कर लिया है, और उनका स्वभाव बदल गया है।
केंद्र सरकार पर तेजस्वी का यह हमला यूपीए शासन के बाद बिहार में एक भी फैक्ट्री न लगने का आरोप लगाता है। उन्होंने कहा, “अमित शाह कहते हैं बिहार में जमीन नहीं है, लेकिन गुजरात में तो सब कुछ है। यह साफ दिखाता है कि वे बिहार के लिए काम ही नहीं करना चाहते।” यह बयान बिहार की आर्थिक उपेक्षा को रेखांकित करता है, जहां प्रवासी मजदूर गुजरात जैसे राज्यों में जाकर काम करते हैं, लेकिन स्थानीय विकास ठप पड़ा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में बेरोजगारी दर 7.6 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत से ऊपर है, और पलायन की समस्या लाखों परिवारों को प्रभावित करती है।
भाजपा की ओर से अभी तक इस बयान पर सीधी प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन पार्टी के नेता पहले ही लालू-तेजस्वी परिवार पर ‘जंगलराज’ लौटाने का आरोप लगा चुके हैं। पीएम मोदी ने हाल ही में बेगूसराय और समस्तीपुर की रैलियों में बिहार को ‘सुशासन से समृद्धि’ की ओर ले जाने का दावा किया था, जहां उन्होंने निवेश और विकास परियोजनाओं का जिक्र किया। हालांकि, विपक्ष इसे ‘जुमला’ बता रहा है। एनडीए के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “तेजस्वी का यह बयान हताशा में दिया गया है। बिहार में निवेश बढ़ रहा है, और चुनाव में जनता फैसला लेगी।”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी का यह प्रहार चुनावी नैरेटिव को बदल सकता है। “यह ‘बिहारी अस्मिता’ को जगाने का प्रयास है, जो 2015 के चुनावों में कामयाब रहा था,” कहते हैं पटना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राम पुनियानी। महागठबंधन को उम्मीद है कि युवा वोटरों में यह संदेश गूंजेगा, जबकि एनडीए विकास कार्ड खेलकर जवाब देगा।



