सुप्रीम कोर्ट ने 30 अगस्त शुक्रवार को पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इस याचिका में स्वामी ने केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की है कि वह रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने के उनके अनुरोध पर जल्द निर्णय ले। रामसेतु, जिसे एडम्स ब्रिज भी कहा जाता है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने स्वामी की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई और केंद्र सरकार को 4 सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी याचिका में कहा है कि रामसेतु, जिसे 'एडम्स ब्रिज' के नाम से भी जाना जाता है, तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित पम्बन द्वीप और श्रीलंका के उत्तर-पश्चिमी तट पर मन्नार द्वीप के बीच चूना पत्थर की एक लंबी श्रृंखला है। यह संरचना हिंदू धर्मग्रंथ रामायण के अनुसार भगवान राम और उनकी वानर सेना द्वारा बनाई गई थी, जिसे करोड़ों लोग पवित्र तीर्थस्थल मानते हैं।
स्वामी ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 19 जनवरी 2023 के आदेश का हवाला दिया, जिसमें केंद्र ने कोर्ट को बताया था कि वह रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने के मुद्दे पर विचार कर रहा है। कोर्ट ने तब केंद्र को इस पर निर्णय लेने का निर्देश दिया था और स्वामी को असंतुष्ट होने पर दोबारा कोर्ट आने की स्वतंत्रता दी थी। स्वामी ने बताया कि उन्होंने 27 जनवरी 2023 और 13 मई 2025 को केंद्र को सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ प्रतिनिधित्व सौंपा था, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है।
स्वामी ने याचिका में मांग की है कि केंद्र सरकार को रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने और इसके संरक्षण के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से सर्वेक्षण कराने का निर्देश दिया जाए। इसके अलावा, उन्होंने रामसेतु को दुरुपयोग, प्रदूषण या अपवित्रता से बचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
रामसेतु का महत्व
रामसेतु, जिसे पौराणिक कथाओं में भगवान राम द्वारा निर्मित पुल माना जाता है, भारत और श्रीलंका के बीच लगभग 35-48 किलोमीटर लंबी चूना पत्थर की श्रृंखला है। वैज्ञानिक और पुरातात्विक अध्ययनों में इसे मानव निर्मित संरचना माना गया है, जिसे 1993 में नासा की सैटेलाइट तस्वीरों ने भी उजागर किया था। स्वामी ने अपनी याचिका में जोर दिया कि रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा देने से इसे किसी भी तरह के दुरुपयोग, प्रदूषण या क्षति से बचाया जा सकेगा। यह दर्जा इसे कानूनी संरक्षण प्रदान करेगा और भविष्य में किसी भी परियोजना, जैसे कि सेतुसमुद्रम शिपिंग नहर परियोजना, से इसके नुकसान की आशंका को कम करेगा।
सेतुसमुद्रम परियोजना और विवाद
रामसेतु को लेकर विवाद 2007 में तब और गहरा गया था, जब यूपीए सरकार ने सेतुसमुद्रम शिपिंग नहर परियोजना शुरू की थी। इस परियोजना में रामसेतु को तोड़ने की योजना थी, जिसका सुब्रमण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में विरोध किया था। कोर्ट ने इस परियोजना पर रोक लगा दी थी, और केंद्र ने आश्वासन दिया था कि वह रामसेतु को नुकसान पहुंचाए बिना वैकल्पिक मार्ग की तलाश करेगा। इस प्रोजेक्ट को लेकर धार्मिक और पर्यावरणीय बहसें भी जोर पकड़ चुकी हैं, क्योंकि रामसेतु को हिंदुओं द्वारा पवित्र तीर्थ स्थल माना जाता है।
स्वामी स्वास्थ्य कारणों से कोर्ट में उपस्थित नहीं हो सके, और उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विभा मखीजा ने पक्ष रखा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार से जल्द जवाब मांगा है। अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी, जिसमें केंद्र को अपना रुख स्पष्ट करना होगा। इस नोटिस के बाद यह उम्मीद जगी है कि दशकों से चले आ रहे इस मुद्दे पर कोई ठोस निर्णय लिया जा सकता है।



