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भारत के 15वें उपराष्ट्रपति बने सीपी राधाकृष्णन,राष्ट्रपति भवन में ली शपथ, समारोह में शामिल हुए दिग्गज नेता

भारत के 15वें उपराष्ट्रपति बने सीपी राधाकृष्णन,राष्ट्रपति भवन में ली शपथ, समारोह में शामिल हुए दिग्गज नेता

चंद्रपुरम पोन्नुसामी राधाकृष्णन ने शुक्रवार को भारत के 15वें उपराष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण की। राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक गरिमामय समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 67 वर्षीय राधाकृष्णन को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। राधाकृष्णन ने लाल कुर्ता पहनकर अंग्रेजी में ईश्वर के नाम पर शपथ ली। यह समारोह सुबह करीब 10 बजे शुरू हुआ और इसमें देश के कई प्रमुख नेता और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू, ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी, कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत, पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया, झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव मौजूद रहे। इसके अलावा, पूर्व उपराष्ट्रपतियों हामिद अंसारी और वेंकैया नायडू ने भी समारोह में शिरकत की।

पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, जिन्होंने स्वास्थ्य कारणों से 21 जुलाई 2025 को पद से इस्तीफा दिया था, भी इस अवसर पर उपस्थित थे और उनकी यह पहली सार्वजनिक उपस्थिति थी। विपक्ष के कुछ नेता, जैसे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, भी समारोह में शामिल हुए, हालांकि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी गुजरात दौरे के कारण उपस्थित नहीं हो सके।

उपराष्ट्रपति चुनाव में मिली थी शानदार जीत

सीपी राधाकृष्णन को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने उपराष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाया था। 9 सितंबर 2025 को संसद भवन में हुए उपराष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने संयुक्त विपक्ष (इंडिया गठबंधन) के उम्मीदवार और पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज बी. सुदर्शन रेड्डी को 152 मतों के अंतर से हराया। राज्यसभा के महासचिव और निर्वाचन अधिकारी पीसी मोदी ने बताया कि कुल 781 सांसदों में से 767 ने मतदान किया, जो 98.2 प्रतिशत मतदान को दर्शाता है। राधाकृष्णन ने 452 प्रथम वरीयता वोट हासिल किए, जबकि रेड्डी को 300 वोट मिले। यह जीत एनडीए की राजनीतिक ताकत और विपक्ष के साथ संतुलन का एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है।

राधाकृष्णन का राजनीतिक सफर

20 अक्टूबर 1957 को तमिलनाडु के तिरुपुर में जन्मे सीपी राधाकृष्णन का राजनीतिक सफर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से शुरू हुआ। मात्र 16 वर्ष की आयु में वे आरएसएस के स्वयंसेवक बने और 1974 में भारतीय जनसंघ की तमिलनाडु इकाई की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य बने। 1996 में उन्हें भाजपा की तमिलनाडु इकाई का सचिव नियुक्त किया गया। राधाकृष्णन 1998 और 1999 में कोयंबटूर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए, हालांकि बाद में उन्हें इस सीट से लगातार तीन बार हार का सामना करना पड़ा।

उन्होंने कई राज्यों में राज्यपाल के रूप में भी कार्य किया, जिनमें महाराष्ट्र, झारखंड और तमिलनाडु शामिल हैं। उपराष्ट्रपति चुने जाने से पहले वे महाराष्ट्र के राज्यपाल थे, लेकिन गुरुवार, 11 सितंबर 2025 को उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया। राधाकृष्णन को तमिलनाडु में सभी दलों के बीच सम्मान प्राप्त है और 2004 में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) द्वारा एनडीए से संबंध तोड़ने के बाद तमिलनाडु में भाजपा के लिए नए गठबंधनों के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

व्यक्तिगत जीवन में, राधाकृष्णन के पास व्यवसाय प्रबंधन में स्नातक की डिग्री है। वे एक उत्साही खिलाड़ी भी रहे हैं, जो कॉलेज स्तर पर टेबल टेनिस चैंपियन और लंबी दूरी के धावक रहे हैं।

उपराष्ट्रपति पद का महत्व

उपराष्ट्रपति का पद भारत में संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह राज्यसभा का सभापति होने का दायित्व भी निभाता है। राधाकृष्णन की यह नई भूमिका न केवल उनके राजनीतिक अनुभव को दर्शाती है, बल्कि देश की संसदीय प्रक्रिया में भी उनकी सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करेगी। उनकी जीत और शपथ ग्रहण को राजनीतिक विश्लेषक संसद में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच संतुलन के एक नए दौर की शुरुआत के रूप में देख रहे हैं।

समारोह का आयोजन

शपथ ग्रहण समारोह की शुरुआत राष्ट्रगान के साथ हुई। इसके बाद, राष्ट्रपति के आदेश पर चुनाव आयोग से प्राप्त उपराष्ट्रपति के निर्वाचन का प्रमाण पत्र पढ़ा गया। फिर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राधाकृष्णन को शपथ दिलाई। समारोह का आयोजन औपचारिक और गरिमामय था, जिसमें सभी उपस्थित नेताओं ने राधाकृष्णन को उनकी नई जिम्मेदारी के लिए शुभकामनाएं दीं। राधाकृष्णन की यह उपलब्धि भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ती है, और उनके अनुभव और नेतृत्व को देश के संवैधानिक ढांचे में महत्वपूर्ण योगदान देने की उम्मीद है।

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