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आज़म खान की रिहाई, पे आफत आई

आज़म खान की रिहाई, पे आफत आई

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जेल से समाजवादी पार्टी (सपा) के वरिष्ठ नेता आजम खान को लगभग 23 महीने की कैद के बाद रिहा कर दिया गया। उनकी रिहाई में कुछ घंटों की देरी हुई, क्योंकि दो मामलों में 8,000 रुपये का जुर्माना बकाया था, जिसे अदालत में जमा करने के बाद ही वे जेल से बाहर आ सके। रिहाई के समय उनके दोनों बेटे—अब्दुल्ला आजम खान और अदीब आजम खान—उन्हें लेने जेल पहुंचे, जो परिवार की एकजुटता का प्रतीक था। जेल के बाहर सपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भारी भीड़ जुटी, लेकिन धारा 144 लागू होने के कारण प्रशासन ने सख्ती बरती और भीड़ को तितर-बितर कर दिया। आजम खान का काफिला सीतापुर से रामपुर की ओर रवाना हो गया, जहां उनका भव्य स्वागत होने की उम्मीद है।


आजम खान की यह कैद अक्टूबर 2023 में शुरू हुई, जब उन्हें रामपुर के 'क्वालिटी बार' भूमि हड़पने के मामले में दोबारा गिरफ्तार किया गया। इससे पहले 2020-2022 के बीच वे 27 महीने जेल में रहे थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत पर बाहर आए। कुल 72 मामलों में फंस चुके आजम पर धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज, भूमि अतिक्रमण और हिंसा जैसे आरोप थे, जो ज्यादातर उनके सत्ता काल (सपा सरकार 2012-17) से जुड़े हैं। हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 18 सितंबर को क्वालिटी बार मामले में जमानत दी, जो उनकी आखिरी लंबित बाधा थी। इससे पहले 10 सितंबर को रामपुर के दुनगरपुर कॉलोनी जबरन खाली कराने के मामले में भी राहत मिली थी। एक 17 साल पुराने सड़क अवरोध मामले में तो वे बरी ही हो गए। यह रिहाई न्यायिक प्रक्रिया की जीत के रूप में देखी जा रही है, लेकिन भाजपा इसे 'राजनीतिक साजिश' बताकर हमला बोल रही है।

परिवार का भावुक पहलू
आजम खान के बेटों—अब्दुल्ला (पूर्व विधायक, स्वार सीट से) और अदीब (जो राजनीति में कम सक्रिय हैं)—का जेल पहुंचना न सिर्फ पारिवारिक समर्थन दर्शाता है, बल्कि खान परिवार की राजनीतिक विरासत को मजबूत करने का संकेत भी। अब्दुल्ला खुद 2020 में फर्जी जन्म प्रमाणपत्र मामले में जेल जा चुके हैं और 2022 में जमानत पर बाहर आकर विधानसभा चुनाव जीते थे। यह रिहाई परिवार के लिए राहत है, खासकर तब जब आजम की पत्नी तंजीन फातिमा भी कई मामलों में फंसी रहीं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और फोटो दिखाते हैं कि बेटों के साथ गले मिलते आजम भावुक नजर आए, जो उनके समर्थकों के लिए प्रेरणा स्रोत बनेगा।

आजम खान की रिहाई उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बड़ा मोड़ है, खासकर मुस्लिम-प्रभावित क्षेत्रों (रामपुर, मुरादाबाद, संभल) में। सपा के लिए यह 'मुस्लिम वोट बैंक' को मजबूत करने का मौका है, जहां 2022 विधानसभा चुनावों में खान की अनुपस्थिति से पार्टी को नुकसान हुआ था। अखिलेश यादव की अगुवाई वाली सपा को अब एक कद्दावर मुस्लिम चेहरा मिल गया है, जो पार्टी की 'पिछड़ा-दलित-मुस्लिम' रणनीति को ताकत देगा। जेल से बाहर आते ही सपा कार्यकर्ताओं की भीड़ और स्वागत की तैयारियां (जैसे रामपुर में रोड शो) दिखाती हैं कि खान का प्रभाव बरकरार है।

दूसरी ओर, भाजपा इसे 'आरोपी की रिहाई' बताकर सपा पर 'परिवारवाद और भ्रष्टाचार' का ठप्पा लगाएगी। योगी सरकार पहले ही रामपुर को 'सांप्रदायिक दंगे मुक्त' बनाने का दावा कर रही है, और खान की वापसी से स्थानीय स्तर पर तनाव बढ़ सकता है। लेकिन 2027 विधानसभा चुनावों से पहले यह सपा को गति देगा—खासकर अगर आजम रामपुर लोकसभा सीट पर दांव खेलें। कुल मिलाकर, यह रिहाई सपा की नैतिक जीत है, लेकिन कानूनी अपीलें लंबित रहेंगी, जो भविष्य में बाधा बन सकती हैं।

आज़म खान का राजनीतिक सफर

1948 में रामपुर में जन्मे आज़म खान ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी की और फिर छात्र राजनीति से अपना सफर शुरू किया। वे समाजवादी पार्टी के संस्थापक नेताओं में से एक रहे और कई बार विधायक तथा मंत्री बने।
रामपुर और पश्चिमी यूपी में उनका प्रभाव इतना गहरा रहा कि उन्हें अक्सर "रामपुर का शेर" कहा गया। उन्होंने जौहर विश्वविद्यालय जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना भी शुरू की, जो आगे चलकर विवादों का कारण बनी।

जेल तक का सफर

आजम खान के खिलाफ समय-समय पर ढेरों मुकदमे दर्ज हुए। आरोपों में ज़मीन कब्ज़ा, धोखाधड़ी, सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण, नफरत फैलाने वाले भाषण और भ्रष्टाचार शामिल हैं।
जौहर विश्वविद्यालय से जुड़ी ज़मीन हड़पने के केस ने उन्हें जेल की राह दिखाई। तकरीबन दो साल के लंबे समय के बाद अदालत से राहत मिलने लगी और अब उनकी रिहाई का रास्ता साफ़ हो रहा है।


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रिहाई का राजनीतिक असर

  1. मुस्लिम राजनीति और सपा की ताकत
    आज़म खान लंबे समय से मुस्लिम वोट बैंक के सबसे बड़े चेहरों में गिने जाते हैं। उनकी अनुपस्थिति से समाजवादी पार्टी को कई बार नुकसान उठाना पड़ा। उनकी वापसी से अल्पसंख्यक वोटों का एकजुट होना और सपा का जनाधार मज़बूत होना तय माना जा रहा है।
  2. सपा के भीतर शक्ति संतुलन
    सपा में अखिलेश यादव की नेतृत्व क्षमता निर्विवाद है, लेकिन आज़म खान की लोकप्रियता और अनुभव को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। उनकी सक्रियता पार्टी की आंतरिक राजनीति को भी प्रभावित करेगी। सवाल यह है कि वे सपा को मजबूती देंगे या पार्टी के भीतर नए समीकरण बनेंगे।
  3. विपक्ष की रणनीति
    भाजपा और अन्य दल आज़म खान की रिहाई को आसान मुद्दा नहीं बनने देंगे। वे भ्रष्टाचार और जमीन कब्ज़े जैसे पुराने आरोपों को लगातार उभारेंगे ताकि उनकी छवि फिर से विवादों में घिरी रहे।
  4. स्थानीय बनाम राष्ट्रीय प्रभाव
    आज़म खान की राजनीति मुख्यतः रामपुर और उसके आस-पास केंद्रित रही है। हालांकि उनकी उपस्थिति सपा के लिए प्रदेशव्यापी संदेश दे सकती है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि वे खुद को क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर कितना प्रभावी बना पाते हैं।

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