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अलीगढ़ हाईवे हादसा: मासूम समेत 5 की जिंदा जलकर दर्दनाक मौत

अलीगढ़ हाईवे हादसा: मासूम समेत 5 की जिंदा जलकर दर्दनाक मौत

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के अकराबाद थाना क्षेत्र में नेशनल हाईवे-34 (एनएच-34) पर गोपी पुल के पास एक भयावह सड़क दुर्घटना हुई। एटा की ओर जा रही एक कार का टायर फट गया, जिससे चालक नियंत्रण खो बैठा और कार डिवाइडर तोड़ते हुए गलत लेन में घुस गई। वहां से आ रहे एक ट्रक (कुछ रिपोर्टों में कैंटर या मिनी-ट्रक बताया गया) से कार की जबरदस्त आमने-सामने टक्कर हो गई। टक्कर के तुरंत बाद दोनों वाहनों में भीषण आग लग गई, जिसमें कार सवार एक मासूम बच्चा, एक महिला, दो पुरुष और ट्रक ड्राइवर समेत कुल 5 लोगों की जिंदा जलकर मौत हो गई। मृतकों की पहचान अभी पूरी तरह से नहीं हो पाई है, लेकिन प्रारंभिक जानकारी के अनुसार कार में एक परिवार सवार था। हादसे के बाद साइट पर अफरा-तफरी मच गई, और ट्रैफिक जाम की स्थिति बन गई।

पुलिस और फायर ब्रिगेड की टीमों ने मौके पर पहुंचकर आग बुझाई, लेकिन ज्यादातर शव इतने झुलस चुके थे कि तुरंत पहचान मुश्किल हो गई। घायलों को (यदि कोई बचा हो) अस्पताल भेजा गया, और शवों को पोस्टमॉर्टम के लिए मोर्चरी ले जाया गया। अलीगढ़ के एसपी रूरल अमृत जैन ने पुष्टि की कि जांच जारी है और ट्रैफिक बहाल करने के प्रयास किए गए। हालांकि, देरी से पहुंची इमरजेंसी सेवाओं ने सवाल खड़े किए – क्या हाईवे पर फायर स्टेशन और एम्बुलेंस की उपलब्धता पर्याप्त है? स्थानीय लोगों ने बताया कि आग लगने के 10-15 मिनट बाद ही मदद पहुंची, जो बचाव की गुंजाइश को कम कर देती है।

मानवीय लापरवाही या सिस्टम की कमजोरी?
यह हादसा सतही तौर पर 'टायर फटना' जैसा सामान्य लग सकता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह भारतीय सड़कों की कई पुरानी समस्याओं का प्रतिबिंब है।

  • वाहन रखरखाव की कमी: पुराने या खराब टायरों का उपयोग आम है, खासकर लंबी दूरी तय करने वाले निजी वाहनों में। कार का टायर फटना संभवतः ओवरलोडिंग, खराब सड़क की वजह से गड्ढों पर दबाव या नियमित चेकअप न होने का नतीजा था। भारत में वाहन निरीक्षण प्रक्रिया (आरटीओ नियमों के तहत) अक्सर कागजी रह जाती है, जिससे ऐसी घटनाएं बढ़ती हैं।
  • हाईवे डिजाइन की खामियां: एनएच-34 जैसे व्यस्त हाईवे पर डिवाइडर मजबूत होने चाहिए, लेकिन कई जगहों पर वे कमजोर होते हैं, जो क्रॉस-ओवर एक्सीडेंट को आमंत्रित करते हैं। सुबह के धुंधले मौसम में विजिबिलिटी कम होना भी एक फैक्टर हो सकता है।
  • ओवरस्पीडिंग और ड्राइवर थकान: प्रारंभिक रिपोर्ट्स में स्पीड का जिक्र नहीं है, लेकिन हाईवे पर 80-100 किमी/घंटा की रफ्तार सामान्य है। रात भर यात्रा करने वाले ड्राइवरों में थकान आम समस्या है।

यह घटना अकेली नहीं है – 2024 में ही उत्तर प्रदेश में 20,000 से अधिक सड़क हादसों में 25,000 मौतें हुईं, जिनमें से 30% आग लगने या जलने से जुड़ी थीं। यह दिखाता है कि समस्या व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संरचनात्मक है।

सड़क सुरक्षा पर सवाल
यह हादसा न केवल एक परिवार का नुकसान है, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी। भारत में हर साल 1.5 लाख सड़क मौतें होती हैं, जिनमें 20% बच्चे और महिलाएं शामिल हैं। अलीगढ़ जैसे जिलों में हाईवे ट्रैफिक बढ़ रहा है (कानपुर-अलीगढ़ रूट व्यावसायिक केंद्र है), लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर पीछे छूट रहा। आग लगने की घटनाएं अक्सर ईंधन लीक या इलेक्ट्रिकल शॉर्ट सर्किट से होती हैं, जो आधुनिक वाहनों में भी हो सकती हैं।

  • सामाजिक प्रभाव: मासूम बच्चे की मौत ने सोशल मीडिया पर शोक की लहर दौड़ा दी। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर यूजर्स ने इसे "दिल दहला देने वाला" बताया, कुछ ने सरकार से सख्त नियमों की मांग की। एक पोस्ट में लिखा, "कार का टायर फटा, डिवाइडर तोड़ते हुए कैंटर से टकराई… बहुत ही भयानक हादसा।" दूसरी पोस्ट में वीडियो शेयर कर कहा गया, "मची चीख-पुकार, हादसा जान कांप उठेंगे आप!"
  • आर्थिक नुकसान: ट्रैफिक जाम से घंटों विलंब, और परिवारों के लिए स्थायी क्षति।

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रोकथाम के उपाय: क्या बदलेगा?
सरकार को तत्काल कदम उठाने चाहिए:

  1. वाहन चेकपॉइंट: हाईवे पर अनिवार्य टायर/ब्रेक इंस्पेक्शन।
  2. इमरजेंसी इंफ्रा: हर 50 किमी पर फायर स्टेशन और हेल्पलाइन।
  3. जागरूकता अभियान: ड्राइविंग स्कूलों में फायर सेफ्टी ट्रेनिंग।
  4. तकनीकी समाधान: वाहनों में ऑटो-फायर सप्रेशन सिस्टम अनिवार्य।

व्यक्तिगत स्तर पर, यात्रियों को ईंधन लीक चेक करना और स्पीड लिमिट का पालन करना चाहिए। यह हादसा याद दिलाता है कि सड़कें सिर्फ कंक्रीट नहीं, जिंदगियां जोड़ती हैं – एक छोटी लापरवाही पूरे परिवार को निगल सकती है।

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