उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के घाटमपुर सर्किल में पुलिस की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यहां के छह थानों में कुल 290 हिस्ट्रीशीटरों की फाइलें दर्ज हैं, लेकिन इनमें से 26 अपराधी लापता हैं। पुलिस को इनके ठिकाने की भनक तक नहीं लगी है। कुछ हिस्ट्रीशीटर तो लंबे समय से गायब हैं, जिससे आशंका है कि वे कहीं और अपराध की दुनिया में सक्रिय हो सकते हैं। इस मामले ने स्थानीय स्तर पर हड़कंप मचा दिया है और पुलिस महकमे में खलबली पैदा कर दी है।
घाटमपुर सर्किल के अंतर्गत आने वाले घाटमपुर, सजेती, साढ़, रेउना, बिधनू और सेन पश्चिमपारा थानों में हिस्ट्रीशीट खुलने के बाद इन अपराधियों पर कड़ी नजर रखने का प्रावधान है। लेकिन आंकड़ों से साफ जाहिर हो रहा है कि यह जिम्मेदारी पूरी तरह निभाई नहीं जा रही। कुल 290 हिस्ट्रीशीटरों में से 18 की मौत हो चुकी है, जबकि 26 लापता बताए जा रहे हैं। इन लापता अपराधियों की तलाश में पुलिस अब सक्रिय हो गई है, लेकिन शुरुआती जांच में कोई ठोस सुराग नहीं मिला है।
थानावार हिस्ट्रीशीटरों का ब्योरा
| थाना का नाम | कुल हिस्ट्रीशीटर | मौत हो चुकी | लापता |
|---|---|---|---|
| घाटमपुर | 96 | 1 | 6 |
| सजेती | 62 | 5 | 3 |
| साढ़ | 48 | 9 | 9 |
| रेउना | 16 | 1 | 2 |
| बिधनू | 31 | 0 | 3 |
| सेन पश्चिमपारा | 37 | 2 | 3 |
| कुल | 290 | 18 | 26 |
साढ़ थाने के क्षेत्र में सबसे ज्यादा 9 हिस्ट्रीशीटर लापता हैं, जो पूरे सर्किल में सबसे चिंताजनक आंकड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन अपराधियों ने पुलिस की नजरों से बचने के लिए जानबूझकर गायब होने का रास्ता चुना हो सकता है। अगर वे अपराध से दूर रहना चाहते, तो यहीं रहकर निगरानी में जीवन बिता सकते थे। लेकिन लापता होने से संदेह बढ़ जाता है कि ये लोग दूसरे जिलों या राज्यों में सक्रिय हो सकते हैं।
पुलिस की लापरवाही या सिस्टम की खामी?
यह मामला पुलिस की निगरानी प्रणाली पर सीधा सवाल खड़ा करता है। हिस्ट्रीशीट खुलने के बाद अपराधियों की लोकेशन ट्रैकिंग, नियमित वेरिफिकेशन और इंटेलिजेंस इनपुट्स के जरिए नजर रखना जरूरी होता है। लेकिन यहां ऐसा नहीं हो पाया। स्थानीय लोगों का कहना है कि अपराधी खुलेआम घूमते हैं और पुलिस की पैट्रोलिंग भी अपर्याप्त है। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "यह एक गंभीर मुद्दा है। हमारी टीमें अब फील्ड में उतर चुकी हैं और हर संभव सुराग तलाश रही हैं। लेकिन सर्किल का विशाल इलाका और संसाधनों की कमी चुनौती है।
दूसरी ओर, सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने मांग की है कि इसकी उच्च स्तरीय जांच हो। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, "पुलिस की निगरानी अगर इतनी ढीली है, तो आम जनता की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी? इन लापता अपराधियों को जल्द पकड़ना जरूरी है, वरना कानून-व्यवस्था पर असर पड़ेगा।"
पुलिस का एक्शन प्लान
इस मामले में एडीसीपी साउथ योगेश कुमार ने सभी थाना प्रभारियों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। उन्होंने कहा, "लापता हिस्ट्रीशीटरों की तत्काल तलाश की जाए। इनके ठिकाने, गतिविधियां और संभावित लोकेशन की पूरी जानकारी एकत्र की जाए। कोई ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।" पुलिस अब इंटरनेट कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर), सोशल मीडिया मॉनिटरिंग और मुखबिरों के नेटवर्क का सहारा ले रही है। उम्मीद है कि जल्द ही इन लापता अपराधियों का सुराग लगेगा।
घाटमपुर सर्किल कानपुर का एक संवेदनशील इलाका है, जहां पहले भी अपराध के कई मामले सामने आ चुके हैं। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि अपराध नियंत्रण के लिए निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है। जिला प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।
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सपा की सरकार मे भी गायब हुए हिस्ट्रीशीटर
समाजवादी पार्टी (सपा) सरकार के दौर में भी ऐसी ही घटनाएं सामने आई थीं। 2017 में शमीली जिले में 87 हिस्ट्रीशीटर गायब पाए गए थे, जब सपा की अखिलेश यादव सरकार सत्ता में थी। यह आंकड़ा घाटमपुर के 26 से कहीं ज्यादा था, और उस समय भी पुलिस की लापरवाही पर जोरदार बहस छिड़ गई थी।
सपा सरकार (2012-2017) के दौरान उत्तर प्रदेश में अपराध के आंकड़े अक्सर चर्चा का विषय रहे। आधिकारिक रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई जिलों में हिस्ट्रीशीट खुलने के बावजूद अपराधियों पर प्रभावी नजर नहीं रखी जा सकी। शमीली जैसे संवेदनशील जिलों में चुनाव से ठीक पहले यह खुलासा हुआ, जब पुलिस ने एंटी-सोशल एलिमेंट्स पर क्रैकडाउन शुरू किया। कुल 703 हिस्ट्रीशीटर्स में से 87 का कोई सुराग नहीं मिला, जबकि 50 की मौत हो चुकी थी। स्थानीय अधिकारियों ने इसे 'ट्रेस न कर पाने' की समस्या बताया, लेकिन विपक्ष ने इसे सपा सरकार की 'माफिया संरक्षण नीति' का नतीजा करार दिया।
सपा दौर में हिस्ट्रीशीटर लापता
सपा सरकार में पुलिस की निगरानी पर कई बार सवाल उठे।
| वर्ष/जिला | लापता हिस्ट्रीशीटर | मुख्य विवरण |
|---|---|---|
| 2017, शमीली | 87 | चुनाव से पहले क्रैकडाउन में गायब पाए गए; 50 की मौत। |
| 2015, बरेली | कई (विशिष्ट संख्या अनुपलब्ध) | फेसबुक पोस्ट पर गिरफ्तारी के बाद हिस्ट्रीशीटर्स की गतिविधियां बढ़ीं; निगरानी ढीली। |
| 2016, उन्नाव | अप्रत्यक्ष (मर्डर केस) | सपा मंत्री के बेटे से जुड़े लापता युवती केस में पुलिस की लापरवाही; देरी से एक्शन। |
ये उदाहरण बताते हैं कि सपा शासनकाल में हिस्ट्रीशीटर्स की ट्रैकिंग में कमी थी। एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में कुल अपराध रिकॉर्ड्स में से कई हिस्ट्रीशीटर्स पुलिस रडार से बाहर हो जाते थे, खासकर ग्रामीण और सीमावर्ती इलाकों में। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि राजनीतिक संरक्षण के कारण पुलिस सक्रिय नहीं हो पाती थी। हालांकि, सपा नेताओं ने इसे 'सिस्टम की पुरानी खामी' बताया और कहा कि उनकी सरकार में अपराध दर में कमी आई थी।
वर्तमान vs सपा दौर: क्या बदला?
आजादी के बाद से उत्तर प्रदेश पुलिस की संरचना में कई बदलाव आए, लेकिन निगरानी की समस्या बनी रही। सपा सरकार में 'ट्रिनेत्रा' जैसे फेस रिकग्निशन सिस्टम की शुरुआत हुई, लेकिन इसका पूर्ण उपयोग नहीं हो सका। वर्तमान योगी सरकार में एनकाउंटर और सख्ती के दावे हैं, लेकिन घाटमपुर जैसी घटनाएं दिखाती हैं कि चुनौतियां अब भी हैं। एक वरिष्ठ विश्लेषक ने कहा, "सपा में लापता हिस्ट्रीशीटर्स को 'माफिया दोस्त' कहा जाता था, लेकिन समस्या जड़ में पुलिस संसाधनों की कमी है।"
पुलिसमहकमा अब दोनों दौरों की तुलना से सबक ले सकता है। घाटमपुर मामले की तरह, सपा दौर में भी तलाश अभियान चलाए गए, लेकिन सफलता सीमित रही। जिला प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि पुरानी कमियों को दूर करने के लिए डिजिटल ट्रैकिंग मजबूत की जाएगी।



