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संघ के 100 वर्ष: राष्ट्र निर्माण और बदलते भारत का आईना

संघ के 100 वर्ष: राष्ट्र निर्माण और बदलते भारत का आईना

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) आज अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे करने की दहलीज पर खड़ा है। 27 सितंबर 1925 को डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा नागपुर में स्थापित इस संगठन ने एक सदी में राष्ट्र निर्माण, सामाजिक सद्भाव और हिंदू एकता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस शताब्दी वर्ष को आरएसएस विजयादशमी 2025 से विजयादशमी 2026 तक एक वर्ष तक मनाएगा, जिसमें देशभर में लाखों कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

आरएसएस की स्थापना उस समय हुई जब भारत स्वतंत्रता संग्राम की ओर बढ़ रहा था, लेकिन डॉ. हेडगेवार का मानना था कि राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ-साथ समाज में अनुशासन, चरित्र निर्माण और राष्ट्रीय भावना का विकास आवश्यक है। उन्होंने 'शाखा' प्रणाली शुरू की, जो आज भी संघ की आधारशिला है। वर्तमान में देशभर में 83,000 से अधिक दैनिक शाखाएं और 32,000 साप्ताहिक मिलन चल रहे हैं, जो लाखों स्वयंसेवकों को जोड़ते हैं। संघ की यात्रा में विभाजन के दौरान हिंदुओं की पुनर्वास, आपातकाल में लोकतंत्र की रक्षा और राम जन्मभूमि आंदोलन जैसे महत्वपूर्ण योगदान शामिल हैं।

शताब्दी वर्ष के प्रमुख कार्यक्रम

इस वर्ष की विजयादशमी (2 अक्टूबर 2025) से शुरू होने वाले शताब्दी उत्सव में आरएसएस ने व्यापक योजनाएं बनाई हैं। नागपुर में मुख्य कार्यक्रम होगा, जहां पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद मुख्य अतिथि होंगे। उनके साथ लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता, उद्योगपति संजीव बजाज और विदेशी प्रतिनिधि जैसे घाना के स्वामी शनकानंद गिरी, दक्षिण अफ्रीका के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री, थाईलैंड के शाही पुजारी भिश्मा रणसीब्राह्मणकुल और इंडोनेशिया के श्री ईदा शामिल होंगे।

  • पथ संचलन और उत्सव: 27 सितंबर 2025 की शाम को नागपुर में तीन स्थानों से एक साथ पथ संचलन निकाला जाएगा - कस्तूरचंद पार्क, यशवंत स्टेडियम और अमरावती रोड पर भारतीय हॉकी ग्राउंड। यह पहली बार है जब संघ तीन समानांतर संचलन आयोजित कर रहा है। विजयादशमी के दिन सुबह 7:40 बजे से शारीरिक प्रदर्शन, शस्त्र पूजन, योग आसन और घोष जैसे कार्यक्रम होंगे। पिछले वर्ष नागपुर में 7,000 स्वयंसेवकों ने भाग लिया था, इस बार संख्या तीन गुना होने की उम्मीद है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम: पूरे वर्ष में 1.03 लाख से अधिक हिंदू सम्मेलन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और युवा केंद्रित गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। ग्राह संपर्क अभियान के तहत संघ के 100 वर्षों के कार्य को घर-घर पहुंचाया जाएगा। बेंगलुरु (7-8 नवंबर), कोलकाता (21 दिसंबर) और मुंबई (6-7 फरवरी) में व्याख्यान श्रृंखला होगी। संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत और सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले सभी प्रांतों का दौरा करेंगे।
  • विशेष कार्यक्रम: 28 सितंबर 2025 को नागपुर में गायक शंकर महादेवन द्वारा संघ गीतों पर आधारित विशेष कार्यक्रम होगा। मणिपुर जैसे क्षेत्रों में भी उत्सव उत्साह से मनाया जाएगा, जहां चुनौतियों के बावजूद संघ का कार्य जारी है।

संघ का दृष्टिकोण और उपलब्धियां

आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील अंबेकर ने कहा, "संघ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि लोगों में विश्वास जगा कि भारत आगे बढ़ सकता है। अगले 100 वर्षों में हम एक ऐसा भारत बनाना चाहते हैं जो विश्व स्तर पर नेतृत्व करे।" संघ पांच परिवर्तनों (पंच-परिवर्तन) पर जोर देता है: नागरिक कर्तव्य, पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली, सामाजिक सद्भाव, पारिवारिक मूल्य और राष्ट्रीय गौरव के लिए व्यवस्था परिवर्तन।

पिछले एक वर्ष में संघ ने 10,000 नई शाखाएं जोड़ीं और लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की त्रिशती पर 10,000 कार्यक्रम आयोजित किए, जिसमें 27 लाख से अधिक लोग शामिल हुए। शिक्षा, ग्रामीण विकास और महिला भागीदारी जैसे क्षेत्रों में संघ की सहयोगी संस्थाएं सक्रिय हैं।

वैश्विक प्रभाव

आरएसएस का प्रभाव अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैल चुका है, जहां विदेशी प्रतिनिधि उत्सव में शामिल हो रहे हैं। संगठन का मानना है कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा से वैश्विक सद्भाव संभव है। शताब्दी वर्ष न केवल अतीत की समीक्षा है, बल्कि भविष्य के लिए संकल्प का अवसर भी।

आरएसएस के इस मील के पत्थर पर राष्ट्रभर में उत्साह है, जो दर्शाता है कि एक छोटी शुरुआत से कैसे एक विशाल संगठन विकसित हो सकता है। यह वर्ष संघ के स्वयंसेवकों और समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा।

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आरएसएस और पीएम मोदी का नाता

नरेंद्र मोदी का आरएसएस से संबंध बचपन से ही शुरू हो गया था। गुजरात के वडनगर में जन्मे मोदी ने किशोरावस्था में ही आरएसएस की शाखाओं में भाग लेना शुरू कर दिया। उन्होंने आरएसएस के स्वयंसेवक के रूप में कार्य किया और बाद में पूर्णकालिक प्रचारक बने। आरएसएस की शिक्षाओं ने उन्हें अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और नि:स्वार्थ सेवा के मूल्यों से परिचित कराया। मोदी खुद कहते हैं कि आरएसएस ने उनके जीवन को दिशा दी और उद्देश्य प्रदान किया। 1985 में आरएसएस ने उन्हें भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में नियुक्त किया, जहां वे धीरे-धीरे ऊंचाइयों पर पहुंचे।

आरएसएस की 'शाखा' प्रणाली, जहां दैनिक व्यायाम, चर्चा और राष्ट्र सेवा पर जोर दिया जाता है, मोदी के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अहमदाबाद में आरएसएस के साथ कठिन दिनचर्या अपनाई, जो भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान पर केंद्रित थी। मोदी ने मार्च 2025 में कहा कि आरएसएस से जुड़ना उनके लिए एक विशेषाधिकार है, जिसने उन्हें जीवन भर की प्रेरणा दी।

राजनीतिक करियर में आरएसएस की भूमिका

आरएसएस बीजेपी का वैचारिक मूल संगठन माना जाता है। मोदी को 1985 में आरएसएस द्वारा बीजेपी में भेजा गया, जहां वे 1998 तक महासचिव बने। 2001 में वे गुजरात के मुख्यमंत्री नियुक्त हुए, और 2014 से वे भारत के प्रधानमंत्री हैं। आरएसएस की विचारधारा, जैसे हिंदू एकता, राष्ट्रवाद और सामाजिक सद्भाव, मोदी सरकार की नीतियों में प्रतिबिंबित होती है। हालांकि, मोदी ने हमेशा जोर दिया है कि उनकी सरकार आरएसएस से सीधे प्रभावित नहीं है, बल्कि राष्ट्र हित पर आधारित है।

आरएसएस और मोदी के बीच का संबंध कभी-कभी संतुलन का विषय भी रहा है। हाल के वर्षों में, विशेषकर 2025 में, मोदी ने आरएसएस की प्रशंसा की है। स्वतंत्रता दिवस 2025 के भाषण में पहली बार उन्होंने आरएसएस का उल्लेख किया, इसे दुनिया का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन बताया जो राष्ट्र निर्माण में लगा हुआ है। उन्होंने कहा कि आरएसएस की सेवा, समर्पण, संगठन और अनुशासन बेजोड़ है। यह भाषण चुनावी संदेश के रूप में भी देखा गया, जहां आरएसएस और बीजेपी के बीच कोई वैचारिक मतभेद नहीं होने की बात उभरी।

वर्तमान परिदृश्य और चुनौतियां

आरएसएस और मोदी के संबंध में शक्ति और अनुशासन का नाजुक संतुलन है। आरएसएस के नेता जैसे मोहन भागवत ने समय-समय पर सरकार की नीतियों पर टिप्पणियां की हैं, लेकिन मोदी ने हमेशा इसे सकारात्मक रूप से लिया है। 2025 में आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने पर मोदी ने इसे राष्ट्र के लिए प्रेरणा बताया। हालांकि, कुछ आलोचक आरएसएस को अल्पसंख्यकों के प्रति असहिष्णु बताते हैं, लेकिन मोदी की सरकार समावेशी विकास पर जोर देती है।

आरएसएस के प्रभाव से मोदी की राजनीति में हिंदू राष्ट्रवाद मजबूत हुआ है, लेकिन वे वैश्विक स्तर पर भारत को एक विकसित राष्ट्र के रूप में पेश करते हैं। आरएसएस की 100 वर्ष की यात्रा में मोदी का योगदान भी उल्लेखनीय है, जहां वे स्वयंसेवकों को प्रेरित करते हैं।

आरएसएस और पीएम मोदी का नाता सिर्फ संगठनात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक और व्यक्तिगत है। यह संबंध भारत की राजनीति को दिशा देता है और राष्ट्र सेवा की भावना को मजबूत करता है। भविष्य में यह नाता और मजबूत हो सकता है, जो भारत को वैश्विक पटल पर मजबूत बनाएगा।

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