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महिला आरक्षण पर संसद में घमासान, पहले दिन ही तीन बड़े बिल पेश, शाह-अखिलेश में दिखी तीखी नोंकझोंक !

महिला आरक्षण पर संसद में घमासान, पहले दिन ही तीन बड़े बिल पेश, शाह-अखिलेश में दिखी तीखी नोंकझोंक !

महिला आरक्षण कानून में संशोधन को लेकर संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र की शुरुआत तीखी बहस के साथ हुई। पहले ही दिन केंद्र सरकार ने तीन अहम विधेयक पेश कर दिए, जिससे सियासी माहौल गर्म हो गया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत कई विपक्षी दलों ने इन बिलों का विरोध किया और प्रक्रिया पर सवाल उठाए। इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा कि विपक्ष केवल तकनीकी आपत्तियां उठा सकता है, लेकिन बिलों की मेरिट पर चर्चा से बच रहा है।

तीन अहम विधेयक हुए पेश
केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 पेश किया। इसके बाद अमित शाह ने केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक 2026 को सदन में रखा। साथ ही परिसीमन विधेयक 2026 भी पेश किया गया। सरकार का कहना है कि ये तीनों विधेयक महिला आरक्षण को लागू करने के लिए जरूरी हैं। लोकसभा में इस पर चर्चा शुरू हो गई, जबकि राज्यसभा की कार्यवाही अगले दिन तक स्थगित कर दी गई।

वोटिंग और विरोध के बीच बढ़ा तनाव
संविधान संशोधन विधेयक पर लोकसभा में वोटिंग कराई गई, जिसमें बड़ी संख्या में सांसदों ने भाग लिया। बिल पेश करने के पक्ष और विपक्ष में वोटिंग के बाद भी राजनीतिक तनाव कम नहीं हुआ। विपक्षी दलों ने मत विभाजन की मांग की और इस कदम को जल्दबाजी बताया। डीएमके, टीएमसी, सीपीएम और एआईएमआईएम के नेताओं ने खुलकर विरोध दर्ज कराया। सरकार की ओर से कहा गया कि यह ऐतिहासिक दिन है और महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा रहा है।

मुस्लिम आरक्षण पर उठा नया विवाद
बहस के दौरान समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण का मुद्दा उठाया और पूछा कि क्या वे आधी आबादी का हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने यह भी सवाल किया कि जनगणना से पहले बिल क्यों लाया गया। इसके जवाब में अमित शाह ने कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण देना असंवैधानिक है और जनगणना की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह केवल विरोध के लिए विरोध कर रहा है।

आगे क्या होगा, इस पर टिकी नजरें
सरकार ने बिलों पर कुल 12 घंटे की चर्चा तय की है और स्पीकर ने मतदान का समय भी घोषित कर दिया है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि बहस के बाद इन विधेयकों का क्या भविष्य होगा। एक तरफ सरकार इसे ऐतिहासिक कदम बता रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष इसे जल्दबाजी और असंतुलन का प्रयास बता रहा है। आने वाले दिन तय करेंगे कि यह फैसला देश की राजनीति और महिला प्रतिनिधित्व को किस दिशा में ले जाएगा।

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