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ईरान–अमेरिका तनाव से थमा केले का निर्यात, किसानों पर मंडराया बड़ा संकट

ईरान–अमेरिका तनाव से थमा केले का निर्यात, किसानों पर मंडराया बड़ा संकट

रमजान और ईद का समय आमतौर पर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के केला उत्पादक किसानों के लिए सबसे फायदेमंद मौसम माना जाता है। खासकर महाराष्ट्र के जलगांव और मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जैसे क्षेत्रों में किसान पूरे साल इस सीजन का इंतजार करते हैं, क्योंकि इसी दौरान खाड़ी देशों में केले की मांग बढ़ जाती है और निर्यात से किसानों को बेहतर कीमत मिलती है। लेकिन इस बार अंतरराष्ट्रीय हालात ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब भारत के कृषि निर्यात पर भी साफ दिखाई देने लगा है। खाड़ी देशों की ओर जाने वाले कई समुद्री और व्यापारिक मार्ग प्रभावित हो गए हैं, जिसके कारण केले की बड़ी खेप बंदरगाहों और रास्तों में ही अटक गई है। कई ट्रकों और कंटेनरों को बीच रास्ते से वापस लौटना पड़ा है। इससे खेतों में तैयार खड़ी फसल और पहले से भेजा गया माल दोनों ही संकट में फंस गए हैं।

बंपर उत्पादन लेकिन बाजार तक पहुंचना मुश्किल

बुरहानपुर जिले के जैनाबाद क्षेत्र में लंबे समय से केले की खेती करने वाले किसान बताते हैं कि यहां हजारों किसान इस फसल पर निर्भर हैं। सरकार की “एक जिला–एक उत्पाद” योजना के तहत भी केले की खेती को बढ़ावा मिला है। उन्नत किस्मों की खेती के कारण यहां से बड़े पैमाने पर केले की खेप विदेशों में भेजी जाती रही है।

किसानों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों से मौसम की मार और प्राकृतिक आपदाओं के कारण पहले ही नुकसान हो रहा था। अब युद्ध जैसे हालात ने समस्या और गंभीर कर दी है। अगर यह स्थिति ज्यादा समय तक बनी रही तो किसानों को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है।

लोकल बाजार में कीमतें बेहद कम

केले की कीमतों में भी तेज गिरावट देखने को मिल रही है। जहां निर्यात के लिए भेजे जाने वाले केले विदेशों में प्रीमियम रेट पर बिकते हैं, वहीं स्थानीय बाजारों में उन्हें काफी कम दाम मिलते हैं। यही वजह है कि बड़ी संख्या में किसान निर्यात पर निर्भर रहते हैं।

खेती से जुड़े लोगों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अच्छी कीमत मिलने की वजह से ही क्षेत्र के कई किसानों ने बड़े पैमाने पर केला उत्पादन शुरू किया था। खासकर जी-9 किस्म का केला खाड़ी देशों में काफी लोकप्रिय है, इसलिए इसकी खेती सबसे ज्यादा की जाती है।

लागत बढ़ने से बढ़ेगी परेशानी

किसानों का कहना है कि निर्यात रुकने का असर केवल मौजूदा फसल पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि आने वाले सीजन की खेती भी प्रभावित हो सकती है। डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से सिंचाई, खाद, दवाइयों और परिवहन की लागत लगातार बढ़ रही है। अगर फसल को उचित दाम नहीं मिला तो किसानों के लिए अगली खेती करना भी मुश्किल हो जाएगा।

कुछ बड़े किसान बताते हैं कि वे दर्जनों एकड़ में केले की खेती करते हैं और हजारों पौधे लगाते हैं। एक पौधे पर औसतन करीब 150 रुपये तक खर्च आता है। ऐसे में निर्यात रुकने से निवेश का बड़ा हिस्सा जोखिम में पड़ गया है।

आने वाले हफ्तों में और बढ़ सकता है संकट

फिलहाल जिले से सीमित मात्रा में केला बाहर जा रहा है, लेकिन मार्च के आखिर तक सामान्य परिस्थितियों में ट्रकों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। अगर तब तक अंतरराष्ट्रीय हालात सामान्य नहीं हुए तो बड़ी मात्रा में माल घरेलू बाजारों में ही बेचना पड़ेगा, जिससे कीमतों में और गिरावट आ सकती है।

हालांकि कुछ किसानों का मानना है कि फिलहाल स्थानीय मंडियों में बिक्री पूरी तरह बंद नहीं हुई है और कीमतें अभी स्थिर हैं। लेकिन यदि पश्चिम एशिया में तनाव जारी रहा तो आने वाले दिनों में बाजार पर इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता है।

पोर्ट पर फंसे कंटेनर, ट्रांसपोर्ट का बढ़ा खर्च

महाराष्ट्र के जलगांव जिले के किसानों को भी इसी तरह की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। कई किसान बताते हैं कि केले से भरे कंटेनर बंदरगाहों पर फंस गए हैं और कुछ ट्रकों को बीच रास्ते से वापस लौटाना पड़ा। इससे ट्रांसपोर्ट का खर्च दोगुना हो गया है।

आम तौर पर रमजान के दौरान हर दिन सैकड़ों ट्रकों में केला खाड़ी देशों के लिए भेजा जाता है, लेकिन इस बार निर्यात लगभग ठप हो गया है। कीमतें भी तेजी से नीचे आई हैं, जिससे किसानों को प्रति क्विंटल हजारों रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

उम्मीद युद्ध खत्म होने पर टिकी

क्षेत्र के हजारों किसान फिलहाल इस उम्मीद में हैं कि जल्द ही हालात सामान्य होंगे और खाड़ी देशों के लिए केला निर्यात फिर से शुरू हो जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो रमजान और ईद के मौके पर वहां की बाजारों में भारतीय केले की आपूर्ति दोबारा शुरू हो सकती है।

लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय तनाव लंबे समय तक जारी रहा, तो खेतों से लेकर बंदरगाहों तक केले की बड़ी मात्रा खराब होने का खतरा भी बढ़ जाएगा। ऐसे में किसानों की मेहनत और उम्मीदें दोनों को बड़ा झटका लग सकता है।
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Ankit Awasthi

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