भगवान शिव वैसे तो कैलाश पर्वत पर रहते हैं. लेकिन धरती पर कई ऐसे स्थान हैं जहां भगवान शिव ने कदम रखा था और आज उनके पैरों के निशान मौजूद हैं। महादेव के पैरों के ये निशान वैज्ञानिकों को भी अचंभित करते हैं। जी हां, आज हम आपको बताएंगे ऐसी पांच जगहों के बारे में जहां भगवान शिव के पैरों के निशान मौजूद हैं। ये निशान 10 हजार साल तक पुराने हैं।
भगवान शिव के पैरों के निशान मौजूद... सबसे पहले बात करते हैं थीरू वेंगड़ू के रूद्र पद की। तमिलनाडु के नागपटनम जिले में स्थित है थीरूवेंगड़ू। एकमात्र ऐसा स्थान जहां भगवान शिव रुद्र रूप में प्रकट हुए थे. यहां मंदिर के गर्भ गृह में रजत प्लेट पर शिव जी के पद्म चिन्हों को साफ तौर पर देखा जा सकता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने यहां अंधकासुर नामक राक्षस को पैर से दबोचकर उसका वध किया था. यह चिन्ह त्रेता युग के माने जाते हैं जबकि मंदिर चोल राजाओं द्वारा 11वीं ईसवी में बनाया गया था. वहीं बहुत से लोग इसे नवग्रह स्थल भी मानते हैं. मान्यता है यहां पूजा करने से शनि राहु केतु के प्रकोप को शांत किया जा सकता है.
नंबर दो पर है असम के तेजपुर का रुद्रपद। असम के तेजपुर से 15 कि.मी दूर रुद्रपद में भगवान शिव ने कामदेव को भस्म किया था. यहां ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर एक गुफा मौजूद है जिसमें भगवान शिव के पद्म चिन्ह साफ तौर पर देखे जाते हैं. वहीं पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग की तो महादेव ने तीसरी आंख खोलकर यानी कामदेव को भस्म कर दिया था। तभी से यह जगह पावन स्थल मानी जाती है। आपको बता दें, भगवान शिव के जो पद्म चिन्ह है वे लगभग 5000 वर्ष पुराने हैं। कल्कि पुराण में इसका उल्लेख भी किया गया है. यह स्थान तांत्रिक साधना का भी केंद्र है. इसे उत्तर पीठ भी कहा जाता है.
नंबर तीन पर है श्रीलंका के श्रीपद चोटी में मौजूद भगवान शिव के पद्म चिन्ह. इस पर्वत को एडम्स पीक के नाम से भी जाना जाता है। एडम्स पीक का पुराना नाम रतन द्वीप पहाड़ है. इस पहाड़ पर एक मंदिर है. यहां भगवान शिव शंकर के पैरों के निशान है. इसीलिए इस स्थान को सिवानोली पदम कहा जाता है यानी कि भगवान शिव का प्रकाश. आपको बता दे, यह पद्म चिन्ह 5 फीट 7 इंच लंबे और 2 फीट 6 इंच चौड़े हैं. लगभग 2 हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित श्रीपद के दर्शन के लिए लाखों भक्त और सैलानी आते हैं. इस पहाड़ के बारे में कहा जाता है कि यह पहाड़ ही वह पहाड़ है जो द्रोणागिरी पर्वत का एक टुकड़ा था और जिसे उठाकर हनुमान जी लाए थे.
चौथे नंबर पर है जागेश्वर में मौजूद भगवान शिव के पद्म. उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 36 कि.मी दूर जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी पर लगभग 4 कि.मी दूर जंगल में एक ऐसा स्थान है जहां भगवान शिव के पद्म चिन्ह को साक्षात देखा जा सकता है. मान्यता है स्वर्ग जाते समय पांडवों की इच्छा भगवान शिव के दर्शन करने की हुई लेकिन शिवजी कैलाश पर्वत पर ध्यान करना चाहते थे। पांडव इसके लिए तैयार नहीं हुए तो शिवजी चालाकी से कैलाश चले गए। जहां से उन्होंने कैलाश की ओर प्रस्थान किया वहां उनके पैर का चिह्न आज भी मौजूद हैं. जहां उन्होंने अपना पहला पैर रखा था वह पैरों के निशान लगभग 3 फुट लंबे हैं जिसमें अंगूठे और उंगलियों के निशान भी स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं. यह निशान पत्थर पर काफी गहरा बना हुआ है.
नंबर पांच पर है शिवपद जो रांची में पहाड़ी पर स्थित नाग देवता का एक मंदिर है. यहां पर आपको बहुत सारे नाग प्रतिवर्ष नाग मंदिर के आसपास देखने को मिल जाएंगे। रांची पहाड़ी पर भगवान शिव जी के अति प्राचीन मंदिर को पहाड़ी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. यहां सबसे हैरानी और रहस्यमय का विषय है भगवान शिव के पैरों के निशान जो लगभग 5 फीट से भी ज्यादा लंबे हैं. वैज्ञानिकों ने जब इसे परखा तो कार्बन डेटिंग के अनुसार यह लगभग 5 से 10,000 ईसा पूर्व के हैं. हमारे पुराणों और विज्ञान के अनुसार ये निशान मानव निर्मित नहीं है बल्कि इन पद्म चिन्हों को किसी दिव्य ऊर्जा द्वारा बनाया गया है।



