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देश का इकलौता गणेश मंदिर जहां गणपति की सवारी है मोर

देश का इकलौता गणेश मंदिर जहां गणपति की सवारी है मोर

भारत में गणेश चतुर्थी का पर्व हर साल बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर भगवान गणेश के मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है, और हर मंदिर की अपनी विशेषता और मान्यता होती है। लेकिन पुणे, महाराष्ट्र में स्थित त्रिशुंड मयूरेश्वर गणपति मंदिर अपनी अनूठी विशेषताओं के कारण देशभर में प्रसिद्ध है।

यह भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां भगवान गणेश अपनी पारंपरिक सवारी मूषक (चूहे) के बजाय मोर पर सवार हैं। इसके अलावा, इस मंदिर में स्थापित गणपति की मूर्ति की तीन सूंड और छह भुजाएं इसे और भी विशेष बनाती हैं। आइए, इस मंदिर के इतिहास, महत्व और विशेषताओं पर विस्तार से नजर डालें।

त्रिशुंड मयूरेश्वर गणपति मंदिर का इतिहास लगभग ढाई सौ साल पुराना है। इस मंदिर की नींव सन 1754 में साधु भिक्षुगिरि गोसावी ने रखी थी, और इसे 1770 में पूर्ण किया गया। शुरुआत में यह एक शिव मंदिर के रूप में स्थापित किया गया था, लेकिन समय के साथ यह भगवान गणेश के एक अनूठे रूप, त्रिशुंड मयूरेश्वर, के लिए प्रसिद्ध हो गया। मंदिर पुणे की सोमवार पेठ की तंग गलियों में स्थित है, जो इसे एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक स्थल बनाता है।

त्रिशुंड मयूरेश्वर की अनोखी मूर्ति

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता भगवान गणेश की मूर्ति है, जो तीन सूंड और छह भुजाओं के साथ स्थापित है। यह मूर्ति काले बेसाल्ट पत्थर से बनी है और कीमती रत्नों से सजी हुई है। गणपति की इस मूर्ति में एक सूंड में लड्डू उकेरा गया है, जो इसे और भी आकर्षक बनाता है। सबसे खास बात यह है कि यहां बप्पा अपनी पारंपरिक सवारी मूषक पर नहीं, बल्कि एक शाही मोर पर सवार हैं।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, गणपति की तीन सूंड जीवन के तीन पहलुओं भौतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक को संतुलित करने की उनकी क्षमता का प्रतीक हैं। कुछ लोग इसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पवित्र त्रिमूर्ति का प्रतीक मानते हैं, जो सृष्टि, पालन और संहार का प्रतिनिधित्व करते हैं।

मोर की सवारी का महत्व

गणेश पुराण के अनुसार, भगवान गणेश ने मयूरेश्वर के रूप में अवतार लिया था, जिसमें उनकी छह भुजाएं थीं और उनका रंग सफेद था। इस रूप में उन्होंने राक्षस सिंधु को परास्त करने के लिए मोर की सवारी की थी। यही कारण है कि इस मंदिर में गणपति को मयूरेश्वर के नाम से पूजा जाता है। मोर, जो आमतौर पर भगवान कार्तिकेय की सवारी माना जाता है, यहां गणेशजी के साथ जुड़ा हुआ है, जो इस मंदिर को और भी विशेष बनाता है।

मंदिर की वास्तुकला

18वीं सदी में निर्मित त्रिशुंड मयूरेश्वर मंदिर अपनी वास्तुकला के लिए भी प्रसिद्ध है। मंदिर का निर्माण एक ही पत्थर से किया गया है, और इसके चारों कोनों पर मीनारें हैं, जो जीवन के चार चरणों का प्रतीक मानी जाती हैं। मंदिर का गर्भगृह उत्तर दिशा की ओर मुख किए हुए है, और इसमें गणेशजी की मूर्ति स्थापित है। मंदिर की दीवारों पर रत्नजड़ित शिल्पकला और जटिल नक्काशी इसे एक कला और इतिहास का संग्रहालय बनाती है। हाल के वर्षों में पुणे नगर निगम ने इस मंदिर के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया है, जिससे यह न केवल श्रद्धालुओं बल्कि पर्यटकों और कला प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गया है।

गणेश चतुर्थी पर मंदिर की रौनक

गणेश चतुर्थी के दौरान त्रिशुंड मयूरेश्वर मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। इस दौरान मंदिर को फूलों, रंगों और रोशनी से सजाया जाता है। भक्त बुद्धि, समृद्धि और सफलता की कामना के साथ बप्पा के दर्शन करने आते हैं। मंदिर में विशेष पूजा, आरती और भजन संध्याओं का आयोजन होता है, जो पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बनाता है। यह उत्सव 10 दिनों तक चलता है, और अंत में भगवान गणेश की मूर्ति का विसर्जन बड़े धूमधाम से किया जाता है।

त्रिशुंड मयूरेश्वर गणपति मंदिर पुणे के सोमवार पेठ इलाके में, कमला नेहरू अस्पताल के पास स्थित है। पुणे रेलवे स्टेशन से मंदिर तक ऑटो या कैब से आसानी से पहुंचा जा सकता है। हालांकि, मंदिर तक का आखिरी हिस्सा पैदल तय करना बेहतर होता है, ताकि आप पुणे की तंग गलियों और स्थानीय संस्कृति का आनंद ले सकें।

मान्यताएं और परंपराएं

मंदिर से जुड़ी एक अन्य मान्यता मोरया गोसावी से संबंधित है। कहा जाता है कि मोरया गोसावी भगवान गणेश के परम भक्त थे और वे हर साल गणेश चतुर्थी पर चिंचवड़ से 95 किलोमीटर पैदल चलकर मयूरेश्वर मंदिर के दर्शन करने जाते थे। एक बार जब वे वृद्धावस्था के कारण मंदिर नहीं जा सके, तो गणेशजी ने उनके सपने में आकर कहा कि अब उन्हें मंदिर आने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वे स्वयं उनके पास आएंगे। अगले दिन मोरया को एक छोटी गणेश मूर्ति मिली, जिसे उन्होंने चिंचवड़ में स्थापित किया। इस घटना से “गणपति बप्पा मोरया” का जयघोष शुरू हुआ, जो आज भी गणेश चतुर्थी के दौरान गूंजता है।

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