भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में शुमार टाटा ग्रुप में इन दिनों सत्ता की जंग छिड़ी हुई है। रतन टाटा के निधन के एक साल बाद ट्रस्ट में दो गुटों के बीच गवर्नेंस और बोर्ड नियुक्तियों को लेकर विवाद चरम पर पहुंच गया है। इसी संकटपूर्ण माहौल में टाटा ट्रस्ट्स ने एक बड़ा फैसला लेते हुए टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन (N. Chandrasekaran) का कार्यकाल 2032 तक बढ़ा दिया है। यह फैसला ग्रुप के इतिहास में पहली बार रिटायरमेंट पॉलिसी से हटकर लिया गया है, जहां आमतौर पर एग्जीक्यूटिव्स को 65 साल की उम्र में पद छोड़ना पड़ता है।
रतन टाटा का 9 अक्टूबर 2024 को निधन होने के बाद टाटा ट्रस्ट्स की कमान उनके सौतेले भाई नोएल टाटा को सौंपी गई। नोएल को ट्रस्ट का चेयरमैन और टाटा संस का बोर्ड मेंबर बनाने का निर्णय विवादों का केंद्र बन गया। ट्रस्ट में दो प्रमुख गुट उभर आए हैं – एक तरफ नोएल टाटा समर्थक, दूसरी तरफ रिफॉर्मिस्ट कैंप, जिसमें वेणु श्रीनिवासन और अन्य ट्रस्टी शामिल हैं।
मुख्य विवाद टाटा संस के बोर्ड में सीटों की नियुक्ति और गवर्नेंस मॉडल को लेकर है। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में 66% हिस्सेदारी है, जो 180 अरब डॉलर के विशाल साम्राज्य को नियंत्रित करती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस खींचतान के कारण ग्रुप को पिछले एक साल में 7.18 लाख करोड़ रुपये का मार्केट वैल्यू लॉस झेलना पड़ा है।
विवाद इतना बढ़ गया कि 7 अक्टूबर 2025 को नोएल टाटा, एन. चंद्रशेखरन, वेणु श्रीनिवासन और डेरियस खंबाटा ने दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात की। लगभग 45 मिनट चली इस बैठक में सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया कि टाटा ग्रुप की स्थिरता राष्ट्रीय महत्व का विषय है। चंद्रशेखरन ने इस दौरान तटस्थ भूमिका निभाई, ताकि ग्रुप की दैनिक गतिविधियां प्रभावित न हों।
क्यों लिया गया यह फैसला?
टाटा ट्रस्ट्स ने 12 अक्टूबर 2025 को सर्वसम्मति से चंद्रशेखरन को तीसरा पांच साल का कार्यकाल देने का ऐलान किया। उनका वर्तमान कार्यकाल फरवरी 2027 में खत्म हो रहा था, जब वे 65 साल के हो जाएंगे। लेकिन अब वे 2032 तक, यानी 70 साल की उम्र तक पद पर बने रहेंगे। यह टाटा ग्रुप के इतिहास में पहला मौका है जब रिटायरमेंट नियमों में छूट दी गई है।
चंद्रशेखरन 2016 में टाटा संस के बोर्ड में शामिल हुए थे और जनवरी 2017 में चेयरमैन बने। उनका पहला कार्यकाल 2022 में खत्म हुआ, उसके बाद दूसरा पांच साल का टर्म मिला। TCS के पूर्व CEO रह चुके चंद्रशेखरन को 'क्राइसिस मैनेजर' और 'विजनरी लीडर' कहा जाता है। उनके नेतृत्व में ग्रुप ने कई बड़े कदम उठाए:
- एयर इंडिया की वापसी: 2022 में टाटा ने एयर इंडिया को खरीदा, जो अब विस्तारा के साथ मर्ज होकर ग्रुप की एविएशन क्षमता को मजबूत कर रहा है।
- इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) और सेमीकंडक्टर: टाटा मोटर्स की EV रेंज का विस्तार, नैनूबा में सेमीकंडक्टर प्लांट की योजना।
- फाइनेंशियल ग्रोथ: पिछले 5 सालों में रेवेन्यू दोगुना (2023-24 में 13.86 लाख करोड़ रुपये), शुद्ध लाभ और मार्केट कैप तिगुना हो गया। ग्रुप 10 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है।
ट्रस्ट्स का मानना है कि चंद्रशेखरन की अगुवाई में चल रही परियोजनाएं – जैसे EV बैटरी मैन्युफैक्चरिंग और इंटरनेशनल एक्सपैंशन – अधर में लटक सकती हैं, इसलिए विस्तार जरूरी था।
चंद्रशेखरन की सफलता की कहानी
एन. चंद्रशेखरन का सफर प्रेरणादायक है। 1963 में तमिलनाडु के टिंगलथंगलम गांव में जन्मे चंद्रा ने कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की। 1987 में TCS में इंटर्न के तौर पर एंट्री की और 35 सालों में ग्रुप के टॉप पर पहुंचे। रतन टाटा के करीबी माने जाने वाले चंद्रशेखरन को लंबी दूरी के मैराथन रनर के रूप में जाना जाता है – जो चुनौतियों से जूझने की क्षमता रखते हैं।
उनके कार्यकाल में टाटा ने डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, टेक्नोलॉजी इनोवेशन और ग्लोबल बिजनेस में नई ऊंचाइयां छुईं। TCS के CEO रहते उन्होंने कंपनी को 1 लाख करोड़ के रेवेन्यू क्लब में शामिल किया।



