मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अब सीधे भारत के बाजार में दिखने लगा है। जहां पहले कच्चे तेल की कीमत बढ़ने की आशंका जताई जा रही थी, वहीं अब स्मार्टफोन भी महंगे हो गए हैं। मार्च तिमाही के दौरान मोबाइल हैंडसेट्स की कीमतों में 15 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसका असर खासतौर पर उन लोगों पर पड़ा है जो नया फोन खरीदने की योजना बना रहे थे।
रुपये की कमजोरी बना बड़ा कारण
टेलीकॉम क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि रुपये की गिरावट इस बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह है। भारत में अधिकतर स्मार्टफोन की असेंबलिंग होती है, लेकिन उनमें इस्तेमाल होने वाली चिप्स और अन्य जरूरी पुर्जे विदेशों से मंगाए जाते हैं। जब रुपये की कीमत गिरती है तो आयात महंगा हो जाता है, जिससे कंपनियों की लागत बढ़ जाती है और उसका असर सीधे ग्राहकों पर पड़ता है।
चिपसेट और ऊर्जा लागत का असर
केवल रुपये की कमजोरी ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर चिपसेट और मेमोरी की कीमतों में भी तेजी आई है। इसके साथ ही ऊर्जा से जुड़े संसाधनों की लागत भी बढ़ी है। मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष के कारण एलएनजी और अन्य ऊर्जा स्रोतों के दाम ऊपर गए हैं, जिससे उत्पादन और सप्लाई चेन पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। यही वजह है कि कंपनियों को अपने उत्पाद महंगे करने पड़े हैं।
बिक्री पर भी पड़ा असर
कीमतों में इस बढ़ोतरी का असर अब बाजार में दिखने लगा है। पिछले 6 वर्षों में पहली बार मोबाइल फोन की बिक्री में करीब 3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। सबसे ज्यादा असर 15 हजार रुपये तक के बजट फोन सेगमेंट में देखा गया है, जहां कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। रिपोर्ट के अनुसार, देश में बिकने वाले 200 से ज्यादा मॉडलों में से 80 से अधिक के दाम बढ़ चुके हैं।
आगे और बढ़ सकती हैं कीमतें
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बढ़ोतरी फिलहाल थमने वाली नहीं है। अगर वैश्विक हालात ऐसे ही बने रहते हैं, तो आने वाली तिमाही में भी कीमतों में इजाफा जारी रह सकता है। साथ ही, मोबाइल बिक्री में 10 प्रतिशत तक की और गिरावट आने की आशंका जताई जा रही है।
ग्राहकों के लिए चुनौतीपूर्ण समय
कुल मिलाकर स्मार्टफोन खरीदना अब पहले जितना आसान नहीं रह गया है। बढ़ती कीमतों और बाजार की अनिश्चितता के बीच ग्राहकों को अब ज्यादा सोच-समझकर फैसला लेना होगा। आने वाले समय में तकनीक की जरूरत तो बनी रहेगी, लेकिन उसकी कीमत चुकाना थोड़ा भारी पड़ सकता है।
