भारत-पाकिस्तान विभाजन को करीब 80 साल होने वाले हैं, लेकिन सिनेमा में इसका दर्द आज भी जिंदा है। इस साल दो बड़ी फिल्में इस विषय को फिर से पर्दे पर लेकर आई हैं। एक तरफ इम्तियाज अली की "मैं वापस आऊंगा" है तो दूसरी तरफ राजकुमार संतोषी की "बंटवारा 1947"। दोनों फिल्मों में विभाजन के दौरान बिछड़े परिवारों, अधूरी मोहब्बतों और इंसानी त्रासदी को केंद्र में रखा गया है। यही वजह है कि हर पीढ़ी के दर्शक इन कहानियों से जुड़ जाते हैं।
मोहब्बत और बिछड़ने की दास्तान
"मैं वापस आऊंगा" एक भावनात्मक कहानी है, जो वर्तमान और अतीत के बीच सफर करती है। फिल्म में एक बुजुर्ग अपने अधूरे प्रेम और बंटवारे के दिनों को याद करता है। कहानी बताती है कि सीमाएं देशों को बांट सकती हैं, लेकिन रिश्तों और भावनाओं को नहीं। यही मानवीय पहलू दर्शकों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। फिल्म में प्रेम, बिछड़न और यादों का ऐसा मेल दिखाया गया है जो विभाजन के दर्द को फिर से जीवित कर देता है।
सनी देओल की नई पेशकश
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आने वाली "बंटवारा 1947" भी काफी चर्चा में है। इस फिल्म में सनी देओल मुख्य भूमिका में नजर आएंगे। कहानी मशहूर नाटक "जिन लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ए नई" से प्रेरित बताई जा रही है। फिल्म में बंटवारे के बाद बदले हालात, उजड़े घरों और टूटते रिश्तों को बड़े पर्दे पर दिखाया जाएगा। दर्शकों को उम्मीद है कि यह फिल्म इतिहास और भावनाओं दोनों को एक साथ पेश करेगी।
1949 से शुरू हुआ सिलसिला
विभाजन पर फिल्में बनना कोई नई बात नहीं है। आजादी के सिर्फ दो साल बाद 1949 में "लाहौर" फिल्म आई थी, जिसे इस विषय पर बनी शुरुआती फिल्मों में गिना जाता है। इसके बाद "छलिया", "धरतीपुत्र", "गरम हवा", "1947 अर्थ", "ट्रेन टू पाकिस्तान", "गदर: एक प्रेम कथा" और "पिंजर" जैसी कई फिल्मों ने विभाजन की पीड़ा को अलग-अलग नजरिए से दिखाया। इन फिल्मों ने न सिर्फ सफलता हासिल की बल्कि इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम भी किया।
दर्शकों से क्यों जुड़ती हैं ये कहानियां
विभाजन सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं था, बल्कि करोड़ों लोगों की जिंदगी बदल देने वाली त्रासदी थी। लाखों लोग अपने घरों से बेघर हुए, परिवार बिछड़ गए और कई रिश्ते हमेशा के लिए टूट गए। यही कारण है कि जब भी इस विषय पर कोई फिल्म बनती है, दर्शक उससे भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं। युद्ध की कहानियां जोश भरती हैं, लेकिन बंटवारे की कहानियां दिल को छू जाती हैं।
आज भी जिंदा है दर्द
सिनेमा में विभाजन का विषय इसलिए बार-बार लौटता है क्योंकि उसकी यादें अब भी समाज के एक हिस्से में जिंदा हैं। कई परिवार आज भी अपने बुजुर्गों से उस दौर की कहानियां सुनते हैं। यही वजह है कि 1947 का दर्द सिर्फ इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि फिल्मों और कहानियों के जरिए आज भी लोगों के दिलों तक पहुंचता है। यही कारण है कि बंटवारे पर बनी हर नई फिल्म दर्शकों के बीच उत्सुकता और भावनाओं दोनों को जगा देती है।
